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मणिपुर की नृत्यकला: भक्ति और लालित्य का दिव्य संगम
मणिपुर की नृत्यकला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह वहाँ के जीवन, धर्म और आध्यात्मिकता का प्रतिबिंब है। भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में मणिपुरी नृत्य अपनी विशिष्ट सौम्यता, गरिमा और भक्ति भाव के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है।
यहाँ मणिपुर की समृद्ध नृत्य परंपरा पर एक विस्तृत लेख है:
मणिपुर को 'गंधर्वों की भूमि' कहा जाता है, जहाँ नृत्य और संगीत को ईश्वर की आराधना का सबसे उत्तम मार्ग माना गया है। मणिपुरी नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी तरलता (Fluidity) है; इसमें शरीर की गति इतनी कोमल होती है कि एक मुद्रा दूसरी मुद्रा में कब विलीन हो जाती है, पता ही नहीं चलता।
1. प्राचीन जड़ें: लाई हराओबा (Lai Haraoba)
मणिपुर की नृत्य परंपरा की शुरुआत प्राचीन उत्सव 'लाई हराओबा' से मानी जाती है। इसका अर्थ है 'देवताओं का आमोद-प्रमोद'। यह नृत्य सृष्टि की रचना के दर्शन को दर्शाता है। इसमें मणिपुर के प्राचीन देवताओं की पूजा की जाती है और यहीं से मणिपुरी नृत्य के 'जागोई' (Jagoi) रूप का विकास हुआ।
2. रासलीला: नृत्य का आध्यात्मिक शिखर
18वीं शताब्दी में राजा भाग्यचंद्र के शासनकाल के दौरान मणिपुर में वैष्णव धर्म के आगमन के साथ 'रासलीला' का विकास हुआ। यह मणिपुरी नृत्य का सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय हिस्सा है।
- इसमें राधा, कृष्ण और गोपियों के प्रेम और भक्ति का चित्रण किया जाता है।
- इसकी गतियाँ बहुत धीमी और लयबद्ध होती हैं।
- इसमें अन्य शास्त्रीय नृत्यों की तरह पैरों को ज़ोर से पटकने (Foot thumping) का प्रयोग नहीं होता, बल्कि नर्तक के पैर जमीन को बहुत कोमलता से छूते हैं।
3. वेशभूषा: 'कुमिल' की अद्वितीय सुंदरता
मणिपुरी नृत्य की वेशभूषा इसे अन्य सभी नृत्यों से अलग बनाती है।
- कुमिल (Kumil): महिला नर्तकियाँ एक बेलनाकार स्कर्ट पहनती हैं जो काफी सख्त होती है और कांच के टुकड़ों व कढ़ाई से सजी होती है।
- पारदर्शी घूंघट: चेहरे पर एक हल्का सफेद पारदर्शी घूंघट डाला जाता है, जो शालीनता और रहस्य का प्रतीक है।
- पुरुष नर्तक आमतौर पर धोती और पगड़ी पहनते हैं।
4. संकीर्तन और पुंग चोलोम (Pung Cholom)
- संकीर्तन: यह मणिपुर की एक अनुष्ठानिक गायन और नृत्य परंपरा है, जिसे UNESCO द्वारा 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' के रूप में मान्यता दी गई है।
- पुंग चोलोम: इसमें नर्तक 'पुंग' (मणिपुरी मृदंग) बजाते हुए अद्भुत गति और कलाबाजी के साथ नृत्य करते हैं। यह कोमल रासलीला के विपरीत बहुत ऊर्जावान और लयबद्ध होता है।
5. मणिपुरी नृत्य की मुख्य विशेषताएँ
- कोमलता: इसमें शरीर के ऊपरी हिस्से (धड़) को बहुत ही लचीले ढंग से घुमाया जाता है।
- मुद्राएँ: इसमें हाथों की मुद्राएँ (Hastas) बहुत सूक्ष्म होती हैं।
- संगीत: इसमें मुख्य रूप से 'पेना' (एक पारंपरिक वाद्ययंत्र), बांसुरी और शंख का प्रयोग किया जाता है। बोल आमतौर पर जयदेव, चंडीदास और विद्यापति जैसे कवियों की रचनाओं पर आधारित होते हैं।
निष्कर्ष
मणिपुरी नृत्यकला अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है। जहाँ आधुनिक दुनिया में नृत्य अक्सर प्रदर्शन पर केंद्रित होता है, वहीं मणिपुर में यह आज भी एक साधना है। यह नृत्य मानव आत्मा का परमात्मा से मिलन का एक दृश्य काव्य है।
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