प्रश्न 1. सही विकल्प चुनकर लिखिए: (1×6=6)
- अवसर लागत को आर्थिक लागत भी कहते हैं। — सत्य
- वस्तु एवं सेवा कर (GST) एक राष्ट्र, एक कर एवं एक बाज़ार की अवधारणा पर आधारित है। — सत्य
- भारतीय रिजर्व बैंक बैंकों का अंतिम ऋणदाता है। — सत्य
- यदि किसी कीमत पर बाज़ार पूर्ति, बाज़ार माँग से अधिक है, तो उस कीमत पर बाज़ार अधिमाँग कहलाती है। — असत्य (यह अधिपूर्ति कहलाती है)
- दो अनधिमान वक्र एक दूसरे को काटते हैं। — असत्य
- बाज़ार माँग वक्र औसत संप्राप्ति वक्र है। — सत्य (पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में)
| 'अ' | 'ब' |
| (i) स्थानापन्न वस्तुएँ | (a) अंतिम उपभोक्ता |
| (ii) पूरक वस्तुएँ | (b) चाय व कॉफी |
| (iii) मूल्य ह्रास | (c) कार एवं पेट्रोल |
| (iv) अंतिम वस्तुएँ | (d) भौतिक पूँजी स्टॉक |
| (v) कीन्स का आय विश्लेषण | (e) प्रतिस्थापन व्यय |
| (vi) निवेश | (f) दीर्घकालीन |
| (g) अल्पकालीन |
| 'अ' | 'ब' |
| (i) स्थानापन्न वस्तुएँ | चाय व कॉफी |
| (ii) पूरक वस्तुएँ | कार एवं पेट्रोल |
| (iii) मूल्य ह्रास | प्रतिस्थापन व्यय |
| (iv) अंतिम वस्तुएँ | अंतिम उपभोक्ता |
| (v) कीन्स का आय विश्लेषण | अल्पकालीन |
| (vi) निवेश | भौतिक पूँजी स्टॉक |
| 'अ' | 'ब' |
| (i) निम्नस्तरीय वस्तुएँ | (a) सीमांत उपभोग प्रवृत्ति |
| (ii) स्टॉक | (b) $1 - APC$ |
| (iii) बजट रेखा की प्रवणता | (c) निश्चित समय |
| (iv) APC | (d) समयावधि |
| (v) प्रवाह | (e) ऋणात्मक |
| (vi) MPS | (f) मोटे अनाज |
| (g) $C/Y$ |
| 'अ' (स्तंभ) | 'ब' (सही मिलान) | |
| (i) निम्नस्तरीय वस्तुएँ | (f) मोटे अनाज | |
| (ii) स्टॉक | (c) निश्चित समय | |
| (iii) बजट रेखा की प्रवणता | (e) ऋणात्मक | |
| (iv) APC | (g) $C/Y$ | |
| (v) प्रवाह | (d) समयावधि | |
| (vi) MPS | (b) $1 - APC$ |
| क्रमांक | स्तंभ 'अ' | स्तंभ 'ब' |
| (i) | साधन की माँग | (i) रिसाव |
| (ii) | N.N.P. | (ii) सकल राष्ट्रीय उत्पादन |
| (iii) | उत्पादक द्वारा यंत्रों का उपयोग | (iii) अंतिम वस्तुएँ |
| (iv) | बढ़ई द्वारा लकड़ी का उपयोग | (iv) मध्यवर्ती वस्तुएँ |
| (v) | बचत | (v) मिश्रित अर्थव्यवस्था |
| (vi) | भारतीय अर्थव्यवस्था | (vi) व्युत्पन्न माँग |
| (vii) शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन |
| क्रमांक | स्तंभ 'अ' | स्तंभ 'ब' (सही उत्तर) |
| (i) | साधन की माँग | (vi) व्युत्पन्न माँग |
| (ii) | N.N.P. | (vii) शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन |
| (iii) | उत्पादक द्वारा यंत्रों का उपयोग | (iii) अंतिम वस्तुएँ |
| (iv) | बढ़ई द्वारा लकड़ी का उपयोग | (iv) मध्यवर्ती वस्तुएँ |
| (v) | बचत | (i) रिसाव |
| (vi) | भारतीय अर्थव्यवस्था | (v) मिश्रित अर्थव्यवस्था |
- कुल संप्राप्ति वक्र का ढाल सदैव धनात्मक होता है।
- पूर्ति का नियम नाशवान (perishable) वस्तुओं पर लागू नहीं होता है।
- पूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक बाज़ार में विक्रेता समरूप (homogeneous) वस्तुओं का विक्रय करते हैं।
- कृषि समर्थन कार्यक्रम द्वारा सरकार कुछ कृषि पदार्थों के लिए तय की गई कीमत का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय कर देती है।
- जॉन मेनार्ड कीन्स की प्रसिद्ध पुस्तक "द जनरल थ्योरी ऑफ एम्प्लॉयमेंट इंटरेस्ट एंड मनी" का प्रकाशन सन् 1936 में हुआ।
- गुणक एवं सीमांत उपभोग प्रवृत्ति के बीच प्रत्यक्ष/सीधा संबंध पाया जाता है।
- दीर्घकाल में उत्पादन के सभी साधन अपरिवर्तनशील होते हैं। — असत्य (दीर्घकाल में सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं।)
- संतुलन की स्थिति में फर्म अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकती है। — सत्य
- उपभोग व्यय = स्वतंत्र उपभोग + प्रेरित उपभोग। — सत्य
- अतिरिक्त मांग की स्थिति में सुधार के लिये सरकारी व्ययों में वृद्धि करना चाहिये। — असत्य (अतिरिक्त माँग घटाने के लिए व्यय कम करने चाहिए।)
- संसद में बजट भाषण गृहमंत्री द्वारा दिया जाता है। — असत्य (वित्त मंत्री द्वारा दिया जाता है।)
- आय, उत्पादन तथा रोजगार सिद्धांत समष्टि अर्थशास्त्र की शाखा नहीं हैं। — असत्य (यह समष्टि अर्थशास्त्र का मुख्य हिस्सा हैं।)
| "अ" | "ब" |
| (i) विनिमय दर में वृद्धि | (a) करारोपण नीति |
| (ii) विनिमय दर में कमी | (b) खुले बाज़ार की क्रियाएँ |
| (iii) राजकोषीय उपाय | (c) पूरक वस्तुएँ |
| (iv) मौद्रिक उपाय | (d) भुगतान संतुलन के अनुकूल |
| (v) कोक एवं पेप्सी | (e) भुगतान संतुलन के प्रतिकूल |
| (vi) पेन एवं स्याही | (f) गिफ्रिन वस्तुएँ |
| (vii) मोटे अनाज | (g) स्थानापन्न वस्तुएँ |
| खण्ड "अ" | खण्ड "ब" |
| (i) विनिमय दर में वृद्धि | (e) भुगतान संतुलन के प्रतिकूल |
| (ii) विनिमय दर में कमी | (d) भुगतान संतुलन के अनुकूल |
| (iii) राजकोषीय उपाय | (a) करारोपण नीति |
| (iv) मौद्रिक उपाय | (b) खुले बाज़ार की क्रियाएँ |
| (v) कोक एवं पेप्सी | (g) स्थानापन्न वस्तुएँ |
| (vi) पेन एवं स्याही | (c) पूरक वस्तुएँ |
| (vii) मोटे अनाज | (f) गिफ्रिन वस्तुएँ |
महत्वपूर्ण प्रश्न -
महत्वपूर्ण प्रश्न -
अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्या क्या है?1. अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्या
अर्थव्यवस्था की सबसे बुनियादी और केन्द्रीय समस्या "चयन की समस्या" है। चूंकि मानवीय आवश्यकताएँ असीमित हैं और उन्हें पूरा करने वाले संसाधन (जैसे- भूमि, श्रम, पूँजी) सीमित और वैकल्पिक उपयोग वाले हैं, इसलिए हर अर्थव्यवस्था को तीन मुख्य निर्णय लेने पड़ते हैं:
क्या उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में? (उपभोक्ता वस्तुएं या पूंजीगत वस्तुएं)उत्पादन कैसे किया जाए? (श्रम प्रधान तकनीक या पूँजी प्रधान तकनीक)उत्पादन किसके लिए किया जाए? (समाज के किस वर्ग के लिए—अमीर या गरीब)केन्द्रीयकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था तथा बाजार अर्थव्यवस्था में कोई 2 अन्तर लिखिए।
आधार
केन्द्रीयकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था
बाजार अर्थव्यवस्था
नियंत्रण
आर्थिक गतिविधियों पर पूरी तरह सरकार या केन्द्रीय अधिकारी का नियंत्रण होता है।
आर्थिक गतिविधियाँ बाजार की शक्तियों (मांग और पूर्ति) द्वारा नियंत्रित होती हैं।
उद्देश्य
इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण करना होता है।
इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है।
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निम्नस्तरीय वस्तु क्या है? उदाहरण दीजिए।
निम्नस्तरीय वस्तु (Inferior Goods) और उदाहरण
निम्नस्तरीय वस्तुएं वे वस्तुएं होती हैं जिनकी मांग उपभोक्ता की आय बढ़ने पर घट जाती है और आय कम होने पर बढ़ जाती है। उपभोक्ता की आय और इन वस्तुओं की मांग के बीच ऋणात्मक संबंध होता है।
उदाहरण: मोटा अनाज (जैसे बाजरा), वनस्पति घी, या पुरानी साइकिल।जब व्यक्ति की आय बढ़ती है, तो वह मोटा अनाज छोड़कर बढ़िया चावल या गेहूं (सामान्य वस्तुओं) की ओर बढ़ जाता है।पूर्ति की कीमत लोच क्या है?
पूर्ति की कीमत लोच (Price Elasticity of Supply)
पूर्ति की कीमत लोच यह मापती है कि किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी पूर्ति की मात्रा में कितना परिवर्तन होता है।
इसका सूत्र निम्न प्रकार है:
$$e_s = \frac{\text{पूर्ति की मात्रा में % परिवर्तन}}{\text{कीमत में % परिवर्तन}}$$
यदि कीमत में थोड़े से बदलाव से पूर्ति में बहुत अधिक बदलाव आता है, तो इसे 'लोचदार पूर्ति' कहते हैं।
दीर्घकाल में एक फर्म का पूर्ति वक्र क्या होता है?
दीर्घकाल में एक फर्म का पूर्ति वक्र (Supply Curve in Long Run)
दीर्घकाल (Long Run) में एक फर्म का पूर्ति वक्र उसके न्यूनतम औसत लागत (Minimum AC) बिंदु के ऊपर स्थित सीमान्त लागत (MC) वक्र का हिस्सा होता है।
शर्त: दीर्घकाल में कोई भी फर्म तब तक उत्पादन नहीं करेगी जब तक कि कीमत ($P$) उसकी न्यूनतम औसत लागत ($LAC$) के बराबर या उससे अधिक न हो।यदि कीमत न्यूनतम $LAC$ से कम है, तो फर्म बाजार छोड़ देगी (पूर्ति शून्य होगी)।बाज़ार सन्तुलन कीमत की विवेचना कीजिए।बाज़ार सन्तुलन कीमत (Market Equilibrium Price)
बाज़ार सन्तुलन वह स्थिति है जहाँ किसी वस्तु की माँग की मात्रा उसकी पूर्ति की मात्रा के बराबर हो जाती है। जिस कीमत पर यह साम्य स्थापित होता है, उसे 'सन्तुलन कीमत' कहते हैं।
यदि कीमत सन्तुलन से अधिक है, तो अधि-पूर्ति (Excess Supply) होगी, जिससे कीमतें नीचे आएंगी।यदि कीमत सन्तुलन से कम है, तो अधि-माँग (Excess Demand) होगी, जिससे कीमतें ऊपर जाएंगी।निम्नतम निर्धारित कीमत क्या है? उदाहरण दीजिए।निम्नतम निर्धारित कीमत (Price Floor)
जब सरकार किसी वस्तु या सेवा के लिए एक न्यूनतम कानूनी सीमा तय कर देती है जिससे कम पर उसे नहीं बेचा जा सकता, तो इसे निम्नतम निर्धारित कीमत या 'फ्लोर प्राइस' कहते हैं। यह आमतौर पर सन्तुलन कीमत से ऊपर तय की जाती है ताकि उत्पादकों के हितों की रक्षा हो सके।
उदाहरण: भारत में सरकार द्वारा किसानों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)। इसका उद्देश्य फसल की कीमतें बहुत ज्यादा गिरने से बचाकर किसानों को सुरक्षा देना है।औसत आय क्या है? सूत्र लिखिए।औसत आय (Average Revenue - AR)
किसी वस्तु की प्रति इकाई बिक्री से प्राप्त होने वाली आय को औसत आय कहते हैं। सामान्य शब्दों में, औसत आय वस्तु की कीमत ($P$) के बराबर होती है।
सूत्र:
$$AR = \frac{TR}{Q}$$
यहाँ:
$AR$ = औसत आय$TR$ = कुल आय (Total Revenue)$Q$ = बेची गई इकाइयाँ (Quantity)अल्पाधिकार से क्या आशय है?
अल्पाधिकार (Oligopoly)
अल्पाधिकार बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें किसी वस्तु के कुछ ही बड़े विक्रेता होते हैं और खरीदारों की संख्या बहुत अधिक होती है।
प्रमुख विशेषता: इसमें फर्में एक-दूसरे पर निर्भर होती हैं (Interdependence)। एक फर्म की कीमत या उत्पादन नीति का असर दूसरी फर्मों पर पड़ता है।उदाहरण: भारत में टेलीकॉम सेक्टर (Jio, Airtel, Vi) या ऑटोमोबाइल सेक्टर।समष्टि आर्थिक विश्लेषण किसे कहते हैं?
समष्टि आर्थिक विश्लेषण (Macroeconomic Analysis)
समष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत पूरी अर्थव्यवस्था के स्तर पर आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। यह व्यक्तिगत इकाइयों (जैसे एक व्यक्ति या एक फर्म) के बजाय सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के योगों का विश्लेषण करता है।
अध्ययन के विषय: राष्ट्रीय आय, कुल रोजगार, सामान्य कीमत स्तर, मुद्रास्फीति, और सरकारी बजट आदि।इसे 'आय और रोजगार का सिद्धांत' भी कहा जाता है।विश्व महामंदी कब एवं क्यों हुई?
विश्व महामंदी (The Great Depression)
विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी 1929 में शुरू हुई और 1930 के दशक के उत्तरार्ध तक जारी रही। इसकी शुरुआत अमेरिका के शेयर बाजार (Wall Street) के धराशायी होने से हुई थी।
क्यों हुई? (मुख्य कारण):
मांग में भारी गिरावट: लोगों की क्रय शक्ति कम होने से वस्तुओं की मांग घट गई।अति-उत्पादन: कृषि और उद्योगों में आवश्यकता से अधिक उत्पादन हो गया, लेकिन खरीदार नहीं थे।बैंकों का विफल होना: ऋण की वसूली न होने के कारण हजारों बैंक बंद हो गए, जिससे लोगों की जमा पूंजी डूब गई।आय का सकल राष्ट्रीय उत्पाद क्या है?सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product - GNP)
सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) एक निश्चित समय अवधि (आमतौर पर एक वर्ष) में किसी देश के सामान्य निवासियों द्वारा उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को कहते हैं। इसमें देश के नागरिकों द्वारा विदेशों में अर्जित आय को जोड़ा जाता है और विदेशियों द्वारा देश के भीतर अर्जित आय को घटाया जाता है।
सूत्र:
$$GNP = GDP + \text{विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय (NFIA)}$$
वैयक्तिक प्रयोज्य आय (Personal Disposable Income - PDI)
वैयक्तिक प्रयोज्य आय वह आय है जो व्यक्तियों और परिवारों के पास सभी प्रकार के प्रत्यक्ष करों (जैसे Income Tax) और सरकार को किए गए अनिवार्य भुगतानों के बाद बचती है। यह वह वास्तविक राशि है जिसे व्यक्ति अपनी इच्छानुसार उपभोग या बचत पर खर्च कर सकता है।
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है?
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System)
वस्तु विनिमय प्रणाली वह पुरानी पद्धति है जिसमें एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का प्रत्यक्ष लेन-देन किया जाता है। इसमें मुद्रा (पैसा) का उपयोग नहीं होता है।
कमी: इसमें "आवश्यकताओं के दोहरे संयोग" (Double Coincidence of Wants) की समस्या होती थी, यानी आपको ऐसा व्यक्ति ढूँढना पड़ता था जिसके पास वह चीज़ हो जो आपको चाहिए और उसे वह चीज़ चाहिए हो जो आपके पास है।मुद्रा के प्रमुख कार्य क्या-क्या हैं?
मुद्रा के प्रमुख कार्य (Functions of Money)
मुद्रा के कार्यों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:
विनिमय का माध्यम: मुद्रा के माध्यम से किसी भी वस्तु या सेवा को आसानी से खरीदा और बेचा जा सकता है।मूल्य का मापक: यह वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को एक समान इकाई (जैसे ₹) में मापने का आधार प्रदान करती है।मूल्य का संचय: मुद्रा को भविष्य के लिए आसानी से बचाकर (बचत) रखा जा सकता है।भावी भुगतान का आधार: इसके माध्यम से ऋण लेना और भविष्य में भुगतान करना आसान हो जाता है।क्या राजकोषीय घाटा आवश्यक रूप से स्फीतिकारी है?
क्या राजकोषीय घाटा आवश्यक रूप से स्फीतिकारी है?
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) हमेशा स्फीतिकारी (Inflationary) यानी महंगाई बढ़ाने वाला नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि घाटे की भरपाई कैसे की जा रही है और पैसा कहाँ खर्च हो रहा है:
नहीं, यदि: सरकार इस पैसे का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क, पुल) या उत्पादन बढ़ाने वाले कार्यों में करती है, तो इससे भविष्य में वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ेगी और महंगाई नहीं बढ़ेगी।हाँ, यदि: सरकार घाटे को पूरा करने के लिए नए नोट छापती है (घाटे का मुद्रीकरण) या केवल उपभोग खर्च (वेतन, सब्सिडी) पर पैसा खर्च करती है, तो इससे बाजार में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ेगी और महंगाई (स्फीति) बढ़ सकती है।जट (Budget) क्या है?बजट एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के दौरान सरकार की अनुमानित प्राप्तियों (आय) और अनुमानित व्यय (खर्च) का एक विस्तृत विवरण होता है। भारत में इसे 'वार्षिक वित्तीय विवरण' (Annual Financial Statement) कहा जाता है।
खुली अर्थव्यवस्था (Open Economy)
एक खुली अर्थव्यवस्था वह है जो दुनिया के अन्य देशों के साथ वस्तुओं, सेवाओं और वित्तीय परिसंपत्तियों का व्यापार करती है। इसमें आयात (Import) और निर्यात (Export) की स्वतंत्रता होती है। वर्तमान में लगभग सभी आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं खुली अर्थव्यवस्थाएं हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की वित्तीय संस्थाओं के नाम बताइये।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वित्तीय संस्थाएँ
वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने और देशों को ऋण प्रदान करने वाली प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं:
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF): यह भुगतान संतुलन की समस्याओं को दूर करने के लिए अल्पकालिक ऋण देता है।विश्व बैंक (World Bank): यह सदस्य देशों को विकास कार्यों (शिक्षा, स्वास्थ्य, ढांचागत विकास) के लिए दीर्घकालिक ऋण देता है।एशियाई विकास बैंक (ADB): यह मुख्य रूप से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकास को बढ़ावा देता है।विश्व व्यापार संगठन (WTO): यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों का निर्धारण करता है।व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर लिखिए।
आधार
व्यष्टि अर्थशास्त्र (Microeconomics)
समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics)
अध्ययन का क्षेत्र
यह व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों (जैसे- एक फर्म, एक उपभोक्ता) का अध्ययन करता है।
यह संपूर्ण अर्थव्यवस्था (जैसे- राष्ट्रीय आय, कुल रोजगार) का अध्ययन करता है।
मुख्य समस्या
इसका मुख्य विषय कीमत निर्धारण (Price Determination) है।
इसका मुख्य विषय आय और रोजगार का निर्धारण है।
अन्य नाम
इसे 'कीमत सिद्धांत' भी कहते हैं।
इसे 'आय और रोजगार का सिद्धांत' भी कहते हैं।
अर्थशास्त्र की विषयवस्तु क्या है?
अर्थशास्त्र की विषयवस्तु (Subject Matter of Economics)
अर्थशास्त्र की विषयवस्तु को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:
व्यष्टि अर्थशास्त्र (Microeconomics): इसमें व्यक्तिगत इकाइयों जैसे उपभोक्ता, फर्म, या एक उद्योग के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसका मुख्य केंद्र कीमत निर्धारण है।समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics): इसमें पूरी अर्थव्यवस्था के स्तर पर आर्थिक मुद्दों का अध्ययन किया जाता है, जैसे राष्ट्रीय आय, कुल रोजगार, मुद्रास्फीति और सरकारी बजट। इसका मुख्य केंद्र आय और रोजगार का निर्धारण है।एक पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार की क्या विशेषताएँ हैं?
पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार की विशेषताएँ
पूर्ण प्रतिस्पर्धा (Perfect Competition) एक आदर्श बाजार स्थिति है जहाँ निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं:
क्रेताओं और विक्रेताओं की अधिक संख्या: बाजार में इतने अधिक खरीदार और विक्रेता होते हैं कि कोई भी अकेला व्यक्ति कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता।समरूप वस्तुएँ: सभी फर्में बिल्कुल एक जैसी (Standardized) वस्तुओं का उत्पादन और विक्रय करती हैं।बाजार का पूर्ण ज्ञान: क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार की कीमतों और स्थितियों की पूरी जानकारी होती है।प्रवेश और बहिर्गमन की स्वतंत्रता: कोई भी नई फर्म बाजार में आ सकती है या पुरानी फर्म बाजार छोड़कर जा सकती है।कीमत स्वीकारक (Price Taker): फर्में कीमत तय नहीं करतीं, बल्कि उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत को स्वीकार करती हैं।वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्वों को लिखिए।
वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्व
किसी वस्तु की पूर्ति (Supply) केवल कीमत पर ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित कारकों पर भी निर्भर करती है:
वस्तु की कीमत: कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है और कीमत घटने पर पूर्ति घटती है।उत्पादन के साधनों की कीमत: यदि कच्चा माल या श्रम महंगा हो जाए, तो लागत बढ़ेगी और पूर्ति घट जाएगी।तकनीकी परिवर्तन: उन्नत तकनीक के उपयोग से उत्पादन लागत कम होती है, जिससे पूर्ति बढ़ती है।फर्मों की संख्या: बाजार में विक्रेताओं की संख्या बढ़ने पर कुल पूर्ति बढ़ जाती है।सरकारी नीति: करों (Taxes) में वृद्धि पूर्ति को घटाती है, जबकि सब्सिडी (Subsidies) पूर्ति को बढ़ाती है।समग्र माँग क्या है? प्रमुख अवयव लिखिए।
समग्र माँग (Aggregate Demand - AD) और इसके अवयव
एक अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समय (वर्ष) के दौरान वस्तुओं और सेवाओं की कुल माँग को समग्र माँग कहते हैं। यह कुल व्यय के बराबर होती है।
प्रमुख अवयव (Components):
निजी उपभोग व्यय ($C$): परिवारों द्वारा वस्तुओं पर किया गया खर्च।निवेश व्यय ($I$): निजी फर्मों द्वारा नई मशीनों या भवनों पर किया गया खर्च।सरकारी व्यय ($G$): सरकार द्वारा सार्वजनिक कल्याण और विकास पर किया गया खर्च।शुद्ध निर्यात ($X - M$): कुल निर्यात और कुल आयात का अंतर।'मितव्ययिता के विरोधाभास' की व्याख्या कीजिए।
मितव्ययिता के विरोधाभास (Paradox of Thrift)
यह सिद्धांत प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे.एम. कीन्स द्वारा दिया गया था।
अर्थ: सामान्यतः बचत करना एक अच्छी आदत मानी जाती है, लेकिन 'मितव्ययिता का विरोधाभास' कहता है कि यदि अर्थव्यवस्था के सभी लोग एक साथ अपनी बचत बढ़ा दें, तो इससे अर्थव्यवस्था में कुल बचत का स्तर कम हो सकता है।तर्क: जब सब लोग अधिक बचत करेंगे, तो उपभोग (खर्च) कम होगा। खर्च कम होने से वस्तुओं की माँग घटेगी, जिससे उत्पादन कम होगा। उत्पादन कम होने से लोगों की आय (Income) घटेगी, और अंततः कम आय के कारण कुल बचत भी घट जाएगी।सरकारी बजट के उद्देश्य क्या हैं? लिखिए।
सरकारी बजट के उद्देश्य (Objectives of Government Budget)
सरकार बजट के माध्यम से देश के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित करती है। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
संसाधनों का पुनः आवंटन: सरकार करों और सब्सिडी के माध्यम से संसाधनों को उन क्षेत्रों में लगाती है जो सामाजिक हित में हों (जैसे नशीली वस्तुओं पर भारी कर और खाद्यान्न पर सब्सिडी)।आय और संपत्ति का पुनर्वितरण: अमीरों पर प्रगतिशील कर लगाकर और गरीबों के कल्याण पर खर्च करके आर्थिक असमानता को कम करना।आर्थिक स्थिरता: अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति (महंगाई) और मंदी के चक्रों को नियंत्रित करना।सार्वजनिक उद्यमों का प्रबंधन: सरकार संचालित उद्योगों के माध्यम से रोजगार और सेवा प्रदान करना।सरकारी वस्तु सरकार के द्वारा ही प्रदान की जानी चाहिए। क्यों?
सरकारी वस्तु सरकार द्वारा ही क्यों प्रदान की जानी चाहिए?
सरकारी वस्तुएं (Public Goods) जैसे—स्ट्रीट लाइट, राष्ट्रीय रक्षा, या पार्क—ऐसी वस्तुएं हैं जिनका लाभ सभी को मिलता है। इनके सरकार द्वारा प्रदान किए जाने के मुख्य कारण हैं:
गैर-वर्जनीयता (Non-excludability): इन वस्तुओं का लाभ लेने से किसी को रोका नहीं जा सकता (चाहे उसने भुगतान किया हो या नहीं)। इसलिए निजी फर्में इनमें निवेश नहीं करतीं क्योंकि वे इनसे लाभ नहीं कमा सकतीं।फ्री-राइडर समस्या: लोग इन सेवाओं के लिए स्वेच्छा से भुगतान नहीं करना चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि यह उन्हें मुफ्त में भी मिल सकती हैं। अतः केवल सरकार ही करों के माध्यम से इनका वित्तपोषण कर सकती है।माँग का नियम एवं माँग वक्र (Law of Demand & Demand Curve)
माँग का नियम: अन्य बातें समान रहने पर, जब किसी वस्तु की कीमत बढ़ती है, तो उसकी माँग घट जाती है और जब कीमत घटती है, तो माँग बढ़ जाती है। कीमत और माँग के बीच ऋणात्मक (विपरीत) संबंध होता है।
माँग वक्र: यह माँग की तालिका का रेखाचित्रीय प्रस्तुतीकरण है। यह ऊपर से नीचे की ओर दाहिनी तरफ झुकता है।
अनधिमान वक्रों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
अनधिमान वक्रों की विशेषताएँ (Features of Indifference Curves)
अनधिमान वक्र (IC) उन दो वस्तुओं के विभिन्न संयोगों को दर्शाता है जिनसे उपभोक्ता को समान संतुष्टि मिलती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं:
ऋणात्मक ढाल: यह हमेशा ऊपर से नीचे दाहिनी ओर झुकता है।मूल बिंदु की ओर उन्नतोदर (Convex): यह घटती हुई सीमांत प्रतिस्थापन दर (MRS) के कारण होता है।दो वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते: क्योंकि प्रत्येक वक्र संतुष्टि के एक अलग स्तर को दर्शाता है।ऊंचा वक्र अधिक संतुष्टि: जितना ऊँचा वक्र होगा, संतुष्टि का स्तर उतना ही अधिक होगा।लागत फलन की संकल्पनाओं को संक्षिप्त में लिखिए।
लागत फलन की संकल्पना (Concepts of Cost Function)
लागत फलन उत्पादन और लागत के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसकी प्रमुख संकल्पनाएं निम्न हैं:
कुल लागत ($TC$): उत्पादन की एक निश्चित मात्रा प्राप्त करने के लिए किया गया कुल खर्च। इसमें स्थिर लागत ($TFC$) और परिवर्तनशील लागत ($TVC$) शामिल होती है। ($TC = TFC + TVC$)औसत लागत ($AC$): प्रति इकाई उत्पादन लागत। ($AC = \frac{TC}{Q}$)सीमान्त लागत ($MC$): उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने से कुल लागत में होने वाली वृद्धि।लागत वक्र U आकार के क्यों होते हैं?
अल्पकाल में औसत लागत ($AC$) और सीमान्त लागत ($MC$) वक्रों का आकार अंग्रेजी के 'U' अक्षर जैसा होता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
परिवर्तनशील अनुपातों का नियम: उत्पादन के शुरुआती चरणों में जब हम स्थिर साधनों के साथ परिवर्तनशील साधनों को बढ़ाते हैं, तो कुशलता बढ़ती है और लागत गिरती है।आंतरिक बचतें: शुरुआत में बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से फर्म को जो बचतें (जैसे तकनीकी या प्रबंधकीय) प्राप्त होती हैं, वे लागत को कम करती हैं।सीमांत उत्पादकता में वृद्धि और फिर कमी: एक निश्चित बिंदु के बाद, साधनों के बीच तालमेल बिगड़ने लगता है और लागतें फिर से बढ़ने लगती हैं, जिससे वक्र ऊपर की ओर मुड़ जाता है।राष्ट्रीय आय गणना की प्रमुख विधियाँ लिखिए।
राष्ट्रीय आय गणना की प्रमुख विधियाँ
राष्ट्रीय आय ($NI$) को मापने की तीन मुख्य विधियाँ हैं:
उत्पाद या मूल्यवर्धित विधि (Value Added Method): इसमें एक वर्ष में देश की सभी उत्पादन इकाइयों द्वारा किए गए कुल मूल्यवर्धन की गणना की जाती है।आय विधि (Income Method): इसमें उत्पादन के साधनों द्वारा प्राप्त कुल पारिश्रमिक (मजदूरी + किराया + ब्याज + लाभ) को जोड़ा जाता है।व्यय विधि (Expenditure Method): इसमें एक वर्ष में अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर किए गए कुल खर्च (उपभोग + निवेश + सरकारी खर्च + शुद्ध निर्यात) का योग किया जाता है।उत्पादन के प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं और इनमें से प्रत्येक के पारिश्रमिक को क्या कहते हैं?
उत्पादन के कारक
पारिश्रमिक (Reward)
भूमि (Land)
किराया या लगान (Rent)
श्रम (Labour)
मजदूरी या वेतन (Wages)
पूँजी (Capital)
ब्याज (Interest)
उद्यमी (Entrepreneur)
लाभ (Profit)
मुद्रा की माँग एवं पूर्ति से क्या तात्पर्य है? लिखिए।मुद्रा की माँग एवं पूर्ति (Demand and Supply of Money)
मुद्रा की माँग: इसका अर्थ है कि लोग अपने पास नकदी (Cash) के रूप में धन क्यों रखना चाहते हैं। इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं: लेन-देन (Transaction), सावधानी (Precautionary), और सट्टा (Speculative) उद्देश्य।मुद्रा की पूर्ति: एक निश्चित समय पर अर्थव्यवस्था में उपलब्ध कुल मुद्रा की मात्रा। इसमें लोगों के पास जमा नकदी, बैंकों में जमा मांग जमा (Demand Deposits) आदि शामिल होते हैं। भारत में इसे $M_1, M_2, M_3, M_4$ जैसे मापों से व्यक्त किया जाता है।रिजर्व बैंक के प्रमुख कार्य बताइये।भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रमुख कार्य
RBI भारत का केंद्रीय बैंक है, इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
नोट निर्गमन (Currency Issuance): देश में मुद्रा छापने का एकमात्र अधिकार RBI के पास है (₹1 के नोट को छोड़कर)।सरकार का बैंकर: यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बैंकिंग संबंधी कार्य करता है और उन्हें वित्तीय सलाह देता है।बैंकों का बैंक: यह देश के अन्य व्यावसायिक बैंकों के लिए अंतिम ऋणदाता (Lender of Last Resort) के रूप में कार्य करता है।साख नियंत्रण (Credit Control): मौद्रिक नीति (जैसे- रेपो रेट, CRR) के माध्यम से बाजार में मुद्रा की आपूर्ति और महंगाई को नियंत्रित करना।विदेशी मुद्रा का संरक्षक: देश के विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करना।बाजार अर्थव्यवस्था किसे कहते हैं?
बाजार अर्थव्यवस्था (Market Economy)
बाजार अर्थव्यवस्था वह आर्थिक प्रणाली है जिसमें उत्पादन, निवेश और वितरण के निर्णय बाजार की शक्तियों (मांग और पूर्ति) द्वारा निर्धारित होते हैं।
इसमें उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है।सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होता है।इसे 'पूँजीवादी अर्थव्यवस्था' या 'मुक्त बाजार' भी कहा जाता है।वस्तुओं की कीमतें बाजार में खरीदारों और विक्रेताओं की आपसी क्रिया द्वारा तय होती हैं।सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण किसे कहते हैं?
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण (Positive Economic Analysis)
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण के अंतर्गत "क्या है" (What is) का अध्ययन किया जाता है। यह तथ्यों और कार्य-कारण संबंधों पर आधारित होता है।
इसमें कोई नैतिक निर्णय या सुझाव नहीं दिया जाता।उदाहरण: "भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है" या "कीमत बढ़ने पर मांग घटती है।" ये ऐसे कथन हैं जिनकी सत्यता की जांच आंकड़ों से की जा सकती है।लाभ किसे कहते हैं?लाभ (Profit)
साधारण शब्दों में, कुल आय (Total Revenue) और कुल लागत (Total Cost) के अंतर को लाभ कहते हैं। अर्थशास्त्र में यह उत्पादन के चौथे साधन यानी 'उद्यमी' को उसकी जोखिम उठाने की क्षमता के बदले मिलने वाला पारिश्रमिक है।
सूत्र:
$$\text{Profit} (\pi) = TR - TC$$
औसत उत्पाद किसे कहते हैं?
औसत उत्पाद (Average Product - AP)
उत्पादन के प्रति इकाई परिवर्तनशील साधन (जैसे श्रम) को औसत उत्पाद कहा जाता है। यह कुल उत्पाद ($TP$) को परिवर्तनशील साधनों की कुल इकाइयों ($L$) से विभाजित करने पर प्राप्त होता है।
सूत्र:
$$AP = \frac{TP}{L}$$
'अदृश्य हाथ' किसे कहते हैं?
'अदृश्य हाथ' (Invisible Hand)
'अदृश्य हाथ' की अवधारणा आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक 'द वेल्थ ऑफ नेशन्स' (1776) में दी थी।
आशय: यह एक अदृश्य बाजार बल है जो स्वार्थ (Self-interest) से प्रेरित व्यक्तियों को अनजाने में समाज के लाभ के लिए कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।स्मिथ के अनुसार, जब हर व्यक्ति अपने लाभ के लिए सबसे अच्छी वस्तु बनाने और बेचने की कोशिश करता है, तो बाजार में प्रतियोगिता बढ़ती है, जिससे वस्तुओं की गुणवत्ता सुधरती है और कीमतें कम होती हैं—जिसका अंततः पूरे समाज को लाभ होता है।उच्चतम निर्धारित कीमत किसे कहते हैं?उच्चतम निर्धारित कीमत (Price Ceiling)
जब सरकार किसी आवश्यक वस्तु या सेवा की एक अधिकतम कानूनी सीमा तय कर देती है, जिससे अधिक कीमत पर उसे नहीं बेचा जा सकता, तो इसे उच्चतम निर्धारित कीमत कहते हैं।
उद्देश्य: यह आमतौर पर गरीब उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सन्तुलन कीमत से कम पर तय की जाती है।उदाहरण: जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें, राशन की दुकानों पर अनाज की दरें या शहरी क्षेत्रों में मकान का किराया नियंत्रण।बाजार संतुलन कीमत किसे कहते हैं?बाजार संतुलन कीमत (Market Equilibrium Price)
बाजार में वह कीमत जिस पर माँग की मात्रा और पूर्ति की मात्रा एक-दूसरे के बिल्कुल बराबर हो जाती है, उसे संतुलन कीमत कहते हैं।
इस बिंदु पर न तो बाजार में 'अधि-माँग' (Shortage) होती है और न ही 'अधि-पूर्ति' (Surplus)।रेखाचित्र में जहाँ माँग वक्र और पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं, वही संतुलन बिंदु होता है।श्रम का सीमांत संप्राप्ति उत्पाद किसे कहते हैं?श्रम का सीमांत संप्राप्ति उत्पाद (Marginal Revenue Product of Labour - $MRP_L$)
श्रम की एक अतिरिक्त इकाई (एक और मजदूर) को काम पर लगाने से फर्म की कुल संप्राप्ति (Total Revenue) में जो वृद्धि होती है, उसे श्रम का सीमांत संप्राप्ति उत्पाद कहते हैं।
सूत्र: $MRP_L = MP_L \times MR$यहाँ $MP_L$ श्रम का सीमांत उत्पाद है और $MR$ सीमांत संप्राप्ति है।उपभोग वस्तुएँ किसे कहते हैं?
उपभोग वस्तुएँ (Consumption Goods)
वे वस्तुएँ जो मानवीय आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से संतुष्ट करती हैं और जिनका उपयोग अंतिम उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है, उपभोग वस्तुएँ कहलाती हैं। इन्हें आगे दो भागों में बांटा जा सकता है:
टिकाऊ वस्तुएँ: जैसे टी.वी., कार, फ्रिज (जो कई वर्षों तक चलती हैं)।गैर-टिकाऊ वस्तुएँ: जैसे दूध, फल, ब्रेड (जो एक ही बार के उपयोग में समाप्त हो जाती हैं)।पूंजीगत वस्तुएँ किसे कहते हैं?पूंजीगत वस्तुएँ (Capital Goods)
पूंजीगत वस्तुएँ वे स्थिर संपत्तियाँ होती हैं जिनका उपयोग उत्पादन प्रक्रिया में अन्य वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन के लिए किया जाता है।
विशेषता: ये वस्तुएँ उपभोग के लिए नहीं होतीं, बल्कि आय सृजन और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए होती हैं। इनमें समय के साथ मूल्यह्रास (Depreciation) होता है।उदाहरण: कारखाने की मशीनें, ट्रैक्टर, उपकरण और औद्योगिक भवन।वैयक्तिक आय किसे कहते हैं?
वैयक्तिक आय (Personal Income - PI)
वैयक्तिक आय वह कुल आय है जो किसी देश के व्यक्तियों या परिवारों को एक वर्ष में सभी स्रोतों से वास्तव में प्राप्त होती है। इसमें न केवल अर्जित आय (मजदूरी, ब्याज) शामिल है, बल्कि हस्तांतरण भुगतान (जैसे वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति) भी शामिल होते हैं, जिनके बदले कोई उत्पादक सेवा नहीं दी जाती।
विशेष: यह 'राष्ट्रीय आय' से अलग है क्योंकि इसमें निगम कर और अवितरित लाभ शामिल नहीं होते।निवल राष्ट्रीय उत्पाद किसे कहते हैं?निवल राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product - NNP)
जब सकल राष्ट्रीय उत्पाद ($GNP$) में से उत्पादन प्रक्रिया के दौरान मशीनों और पूंजी की टूट-फूट या घिसावट व्यय (मूल्यह्रास/Depreciation) को घटा दिया जाता है, तो शेष बची राशि को निवल राष्ट्रीय उत्पाद ($NNP$) कहते हैं।
सूत्र:
$$NNP = GNP - \text{मूल्यह्रास (Depreciation)}$$
साधन लागत पर $NNP$ को ही वास्तविक 'राष्ट्रीय आय' कहा जाता है।SLR किसे कहते हैं?वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio - SLR)
यह भारतीय रिजर्व बैंक ($RBI$) द्वारा निर्धारित वह नियम है जिसके तहत व्यावसायिक बैंकों को अपनी कुल जमा (NDTL) का एक निश्चित प्रतिशत हिस्सा तरल रूप (नकदी, सोना या सरकारी प्रतिभूतियों) में अपने पास सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है।
उद्देश्य: इसका उपयोग अर्थव्यवस्था में ऋण की मात्रा को नियंत्रित करने और बैंकों की तरलता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।उच्च शक्तिशाली मुद्रा क्या है?उच्च शक्तिशाली मुद्रा (High Powered Money - H)
उच्च शक्तिशाली मुद्रा को 'आधारभूत मुद्रा' भी कहा जाता है। यह वह मुद्रा है जो सीधे केंद्रीय बैंक (जैसे $RBI$) द्वारा जारी की जाती है। इसमें मुख्य रूप से दो चीजें शामिल होती हैं:
जनता के पास उपलब्ध करेंसी (नोट और सिक्के)।व्यावसायिक बैंकों का नकद आरक्षित भंडार (जो वे $RBI$ के पास और अपने पास रखते हैं)।सूत्र:
$$H = C + R$$
(जहाँ $C$ = करेंसी और $R$ = नकद भंडार)
उपभोग फलन किसे कहते हैं?
उपभोग फलन (Consumption Function)
उपभोग फलन आय ($Y$) और उपभोग ($C$) के बीच के कार्यात्मक संबंध को दर्शाता है। यह बताता है कि आय के विभिन्न स्तरों पर लोग अपनी आय का कितना हिस्सा वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करते हैं।
जैसे-जैसे आय बढ़ती है, उपभोग भी बढ़ता है, लेकिन उपभोग में होने वाली वृद्धि आय में होने वाली वृद्धि से कम होती है (क्योंकि लोग आय का कुछ हिस्सा बचाने लगते हैं)।समग्र माँग के दो घटक लिखिए।समग्र माँग (AD) के दो प्रमुख घटक
समग्र माँग से अभिप्राय एक अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कुल माँग से है। इसके दो मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:
निजी उपभोग व्यय ($C$): परिवारों द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया खर्च।निवेश व्यय ($I$): निजी उद्यमियों द्वारा नई पूँजीगत संपत्तियों (जैसे मशीनें, कारखाने) पर किया गया खर्च।न्यून माँग के दो कारण लिखिए।न्यून माँग (Deficient Demand) के दो कारण
जब अर्थव्यवस्था में समग्र माँग, पूर्ण रोजगार के स्तर पर आवश्यक समग्र पूर्ति से कम होती है, तो उसे न्यून माँग कहते हैं। इसके मुख्य कारण हैं:
मुद्रा की पूर्ति में कमी: यदि बैंकिंग प्रणाली द्वारा साख (Loan) का संकुचन किया जाए, तो लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा कम हो जाता है।सरकारी व्यय में कटौती: यदि सरकार विकास कार्यों या सार्वजनिक कल्याण पर खर्च कम कर दे, तो बाजार में माँग गिर जाती है।अध्याधिक माँग से क्या अभिप्राय है?अत्यधिक माँग (Excess Demand)
अत्यधिक माँग वह स्थिति है जिसमें समग्र माँग ($AD$), पूर्ण रोजगार के स्तर पर उपलब्ध समग्र पूर्ति ($AS$) से अधिक हो जाती है।
प्रभाव: चूंकि उत्पादन पूर्ण रोजगार के स्तर पर पहुँच चुका होता है, इसलिए उत्पादन को और नहीं बढ़ाया जा सकता। इसका परिणाम केवल कीमतों में वृद्धि (मुद्रास्फीति) के रूप में सामने आता है। इसे 'स्फीतिकारी अंतराल' (Inflationary Gap) भी कहा जाता है।प्रभावपूर्ण माँग क्या है?प्रभावपूर्ण माँग (Effective Demand)
प्रभावपूर्ण माँग का विचार प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे.एम. कीन्स ने दिया था। समग्र माँग का वह स्तर जहाँ वह समग्र पूर्ति के बराबर हो जाती है, 'प्रभावपूर्ण माँग' कहलाता है।
यह वह बिंदु है जहाँ अर्थव्यवस्था संतुलन में होती है।कीन्स के अनुसार, रोजगार का स्तर इसी प्रभावपूर्ण माँग पर निर्भर करता है। यदि इसे बढ़ाया जाए, तो रोजगार और उत्पादन का स्तर भी बढ़ता है।सेटेरिस पारिबस की मान्यता किसे कहते हैं?सेटेरिस पारिबस (Ceteris Paribus)
'सेटेरिस पारिबस' एक लैटिन वाक्यांश है जिसका अर्थ है "अन्य बातें समान रहने पर" (All other things being equal)।
मान्यता: अर्थशास्त्र के नियमों (जैसे माँग का नियम) का प्रतिपादन करते समय हम यह मान लेते हैं कि केवल संबंधित चरों (जैसे कीमत) में बदलाव हो रहा है और अन्य प्रभावित करने वाले कारक (जैसे उपभोक्ता की आय, रुचि, अन्य वस्तुओं की कीमत) स्थिर हैं।इसके बिना आर्थिक सिद्धांतों का वैज्ञानिक अध्ययन करना कठिन होता है।स्थापन्न वस्तुएं तथा पूरक वस्तुओं में अंतर लिखिए।आधार
स्थापन्न वस्तुएं (Substitute Goods)
पूरक वस्तुएं (Complementary Goods)
परिभाषा
वे वस्तुएं जिनका एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है।
वे वस्तुएं जो किसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए एक साथ उपयोग की जाती हैं।
कीमत संबंध
एक वस्तु की कीमत बढ़ने पर दूसरी की माँग बढ़ती है।
एक की कीमत बढ़ने पर दूसरी की माँग घटती है।
उदाहरण
चाय और कॉफी, पेप्सी और कोक।
कार और पेट्रोल, पेन और स्याही।
किसी वस्तु की माँग को प्रभावित करने वाले कोई 3 कारक लिखिए।
वस्तु की माँग को प्रभावित करने वाले 3 कारक
किसी वस्तु की माँग केवल उसकी कीमत पर ही नहीं, बल्कि निम्न कारकों पर भी निर्भर करती है:
उपभोक्ता की आय: सामान्य वस्तुओं के लिए आय बढ़ने पर माँग बढ़ती है, जबकि निम्नस्तरीय वस्तुओं के लिए आय बढ़ने पर माँग घटती है।सम्बन्धित वस्तुओं की कीमतें: स्थापन्न और पूरक वस्तुओं की कीमतों में बदलाव सीधे माँग को प्रभावित करता है।उपभोक्ता की रुचि और प्राथमिकता: यदि उपभोक्ता का रुझान किसी वस्तु के प्रति बढ़ता है (जैसे फैशन या मौसम के कारण), तो उसकी माँग बढ़ जाती है।कुल उपयोगिता तथा सीमांत उपयोगिता में 3 संबंध लिखिए।कुल उपयोगिता (TU) तथा सीमांत उपयोगिता (MU) में संबंध
इन दोनों के बीच के संबंध को निम्न 3 बिंदुओं से समझा जा सकता है:
वृद्धि और गिरावट: जब तक $MU$ धनात्मक होती है, तब तक $TU$ बढ़ती रहती है।अधिकतम बिंदु: जब $MU$ शून्य (Zero) हो जाती है, तब $TU$ अपने अधिकतम (Maximum) स्तर पर होती है। इसे 'पूर्ण तृप्ति का बिंदु' कहते हैं।ऋणात्मक संबंध: जब $MU$ ऋणात्मक (Negative) होने लगती है, तो $TU$ गिरना शुरू हो जाती है।पूर्णतया लोचदार मांग तथा पूर्णतया वेलोचदार मांग को संक्षेप में समझाइये।पूर्णतया लोचदार बनाम पूर्णतया वेलोचदार माँग
पूर्णतया लोचदार माँग ($E_d = \infty$): जब प्रचलित कीमत पर माँग अनंत हो, लेकिन कीमत में बहुत मामूली वृद्धि होने पर माँग शून्य हो जाए। इसका माँग वक्र $X$-अक्ष के समांतर एक क्षैतिज रेखा होती है।पूर्णतया वेलोचदार माँग ($E_d = 0$): जब कीमत में कितना भी परिवर्तन हो (वृद्धि या कमी), माँग की मात्रा में कोई बदलाव न हो। इसका माँग वक्र $Y$-अक्ष के समांतर एक खड़ी रेखा होती है। (जैसे- नमक या जीवन रक्षक दवाएं)।श्रेणी
संकेत (Ed)
वक्र की स्थिति
याद रखने का तरीका
पूर्णतया वेलोचदार
$0$
लंबवत (खड़ी रेखा)
बिल्कुल नहीं बदलता (नमक)
वेलोचदार
$< 1$
ढालू (ज्यादा खड़ा)
बदलाव बहुत कम (आवश्यक वस्तुएं)
इकाई लोचदार
$1$
आयताकार अतिपरवलय
जितना दाम बदला, उतनी माँग बदली
लोचदार
$> 1$
चपटा (कम ढाल)
कीमत से ज्यादा बदलाव (विलासिता)
पूर्णतया लोचदार
$\infty$
क्षैतिज (पड़ी रेखा)
मामूली बदलाव पर अनंत मांग
लाभ अधिकतमीकरण की तीन शर्तें लिखिए।
लाभ अधिकतमीकरण की तीन शर्तें
एक फर्म द्वारा लाभ को अधिकतम करने के लिए निम्नलिखित तीन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:
सीमांत लागत = सीमांत संप्राप्ति ($MC = MR$): उत्पादन के उस स्तर पर जहाँ $MC$ और $MR$ बराबर हों।बढ़ती हुई सीमांत लागत: संतुलन बिंदु पर $MC$ वक्र, $MR$ वक्र को नीचे से काटना चाहिए। अर्थात संतुलन के बाद $MC$ बढ़नी चाहिए।कीमत और औसत लागत का संबंध: * अल्पकाल में: कीमत ($P$) $\ge$ औसत परिवर्तनशील लागत ($AVC$)।दीर्घकाल में: कीमत ($P$) $\ge$ औसत लागत ($AC$)।भारतीय रिजर्व बैंक की किस भूमिका को 'अंतिम ऋणदाता' कहा जाता है?
'अंतिम ऋणदाता' (Lender of Last Resort) के रूप में RBI
भारतीय रिजर्व बैंक की "बैंकों का बैंक" वाली भूमिका को 'अंतिम ऋणदाता' कहा जाता है।
आशय: जब किसी व्यावसायिक बैंक को कहीं और से (बाजार या अन्य बैंकों से) ऋण प्राप्त नहीं हो पाता और वह वित्तीय संकट में होता है, तब वह अंत में RBI के पास जाता है। RBI उस बैंक की वैध प्रतिभूतियों के बदले ऋण देकर उसे दिवालिया होने से बचाता है और बैंकिंग प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखता है।मुद्रापूर्ति के नियंत्रण के तीन नीतिगत उपकरण लिखिए।मुद्रापूर्ति नियंत्रण के तीन नीतिगत उपकरण
RBI मुद्रापूर्ति को नियंत्रित करने के लिए 'मौद्रिक नीति' के इन उपकरणों का प्रयोग करता है:
रेपो दर (Repo Rate): वह दर जिस पर RBI व्यावसायिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। इसे बढ़ाकर मुद्रापूर्ति कम की जाती है।नकद आरक्षित अनुपात (CRR): व्यावसायिक बैंकों को अपनी कुल जमा का जो हिस्सा नकद रूप में RBI के पास रखना पड़ता है। CRR बढ़ने से बैंकों की ऋण देने की क्षमता घटती है।खुले बाजार की क्रियाएं (OMO): इसके अंतर्गत RBI बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों (Bonds) की खरीद-बिक्री करता है। प्रतिभूतियाँ बेचने से बाजार से पैसा कम हो जाता है।एक वस्तु की माँग पर विचार करें। 5 रूपये की कीमत पर इस वस्तु की 15 इकाइयों की माँग है। मान लीजिए वस्तु की कीमत बढ़कर 7 रूपये हो जाती है और परिणामस्वरूप माँग घटकर 12 इकाई हो जाती है। कीमत लोच की गणना कीजिए।माँग की कीमत लोच की गणना
दिया गया है:
प्रारंभिक कीमत ($P_1$) = 5, नई कीमत ($P_2$) = 7 $\rightarrow$ परिवर्तन ($\Delta P$) = $7 - 5 = 2$प्रारंभिक माँग ($Q_1$) = 15, नई माँग ($Q_2$) = 12 $\rightarrow$ परिवर्तन ($\Delta Q$) = $12 - 15 = -3$सूत्र: $E_d = \frac{\Delta Q}{\Delta P} \times \frac{P_1}{Q_1}$
गणना:
$$E_d = \frac{-3}{2} \times \frac{5}{15}$$
$$E_d = \frac{-3}{2} \times \frac{1}{3}$$
$$E_d = -0.5$$
उत्तर: माँग की लोच 0.5 है (ऋणात्मक चिह्न केवल विपरीत संबंध दर्शाता है)। यह वेलोचदार माँग की स्थिति है क्योंकि लोच 1 से कम है।
माँग के नियम की सचित्र व्याख्या संक्षिप्त में कीजिए।माँग के नियम की सचित्र व्याख्या
नियम: अन्य बातें समान रहने पर, किसी वस्तु की कीमत घटने पर उसकी माँग बढ़ती है और कीमत बढ़ने पर माँग घटती है।
व्याख्या: माँग वक्र (DD) ऊपर से नीचे दाहिनी ओर झुकता है। चित्र में देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे $Y$-अक्ष पर कीमत नीचे आती है, $X$-अक्ष पर माँग की मात्रा बढ़ती जाती है।
कुल परिवर्ती लागत तथा कुल स्थिर लागत में 4 अंतर लिखिए।आधार
कुल स्थिर लागत (TFC)
कुल परिवर्ती लागत (TVC)
परिभाषा
यह उत्पादन के स्थिर साधनों पर किया गया खर्च है।
यह उत्पादन के परिवर्तनशील साधनों पर किया गया खर्च है।
उत्पादन से संबंध
उत्पादन शून्य होने पर भी यह शून्य नहीं होती।
उत्पादन शून्य होने पर यह भी शून्य हो जाती है।
परिवर्तन
उत्पादन की मात्रा बदलने पर यह नहीं बदलती।
उत्पादन बढ़ने पर बढ़ती है और घटने पर घटती है।
उदाहरण
भवन का किराया, स्थायी कर्मचारियों का वेतन।
कच्चे माल की लागत, आकस्मिक श्रम की मजदूरी।
राजस्व व्यय एवं पूँजीगत व्यय में भेद कीजिए।आधार
राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)
पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure)
परिसंपत्ति/देयता
इससे न तो परिसंपत्ति का निर्माण होता है और न ही देयता (Liability) कम होती है।
इससे परिसंपत्तियों का निर्माण होता है या सरकार की देयता कम होती है।
प्रकृति
यह आवर्ती (Recurring) प्रकृति का होता है, यानी बार-बार करना पड़ता है।
यह गैर-आवर्ती (Non-recurring) प्रकृति का होता है।
उद्देश्य
यह सरकारी विभागों और सेवाओं के सामान्य संचालन के लिए होता है।
यह भविष्य में आय बढ़ाने या विकास कार्यों के लिए होता है।
उदाहरण
वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान, सब्सिडी।
स्कूल-अस्पताल का निर्माण, मशीनों की खरीद, ऋण की वापसी।
घाटे के बजट से क्या अभिप्राय है? इसके प्रकारों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
घाटे का बजट और इसके प्रकार
जब सरकार का अनुमानित कुल व्यय (खर्च), उसकी अनुमानित कुल प्राप्तियों (आय) से अधिक हो जाता है, तो उसे घाटे का बजट कहते हैं।
घाटे के मुख्य प्रकार:
राजस्व घाटा (Revenue Deficit): जब राजस्व व्यय, राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो। यह बताता है कि सरकार अपने सामान्य खर्चों के लिए भी उधार ले रही है।राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): कुल व्यय और उधार को छोड़कर कुल प्राप्तियों का अंतर। यह सरकार की कुल ऋण आवश्यकताओं को दर्शाता है।प्राथमिक घाटा (Primary Deficit): राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान को घटाने पर प्राप्त राशि।व्यापार संतुलन एवं भुगतान संतुलन में 4 अंतर लिखिए।आधार
व्यापार संतुलन (Balance of Trade)
भुगतान संतुलन (Balance of Payments)
क्षेत्र
यह एक संकुचित अवधारणा है।
यह एक व्यापक अवधारणा है।
मदें
इसमें केवल दृश्य मदों (वस्तुओं) का आयात-निर्यात शामिल है।
इसमें दृश्य, अदृश्य (सेवाएं) और पूँजीगत अंतरण शामिल हैं।
संतुलन
यह पक्ष में, विपक्ष में या संतुलित हो सकता है।
यह लेखांकन की दृष्टि से हमेशा संतुलित रहता है।
त्रुटियाँ
व्यापार संतुलन का घाटा BOP द्वारा पूरा किया जा सकता है।
BOP के घाटे को व्यापार संतुलन से पूरा नहीं किया जा सकता।
स्थिर विनिमय दर के दो गुण एवं दो दोष संक्षिप्त में लिखिए।
स्थिर विनिमय दर (Fixed Exchange Rate) के गुण एवं दोष
जब किसी देश की मुद्रा की दर सरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा किसी अन्य विदेशी मुद्रा या सोने के मूल्य के साथ निश्चित कर दी जाती है, तो उसे स्थिर विनिमय दर कहते हैं।
दो गुण:
आर्थिक स्थिरता: विनिमय दर में बार-बार बदलाव न होने से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता खत्म होती है।पूँजी प्रवाह को बढ़ावा: निश्चित दर होने के कारण विदेशी निवेशक निवेश करने में सुरक्षित महसूस करते हैं।दो दोष:
विदेशी मुद्रा भंडार की आवश्यकता: दर को स्थिर बनाए रखने के लिए सरकार को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार रखना पड़ता है।स्वतंत्र मौद्रिक नीति का अभाव: देश अपनी आंतरिक आर्थिक स्थिति के अनुसार स्वतंत्र रूप से मुद्रा आपूर्ति के फैसले नहीं ले पाता।माँग का अर्थ लिखिये ।माँग (Demand) का अर्थ
साधारण बोलचाल में माँग का अर्थ 'इच्छा' से लिया जाता है, लेकिन अर्थशास्त्र में माँग का अर्थ किसी वस्तु की उस मात्रा से है जिसे एक उपभोक्ता एक निश्चित समय में, एक निश्चित कीमत पर खरीदने की इच्छा रखता हो और उसे खरीदने की क्षमता (क्रय शक्ति) भी रखता हो।
माँग की कीमत लोच का अर्थ लिखिये ।माँग की कीमत लोच (Price Elasticity of Demand)
माँग की कीमत लोच यह बताती है कि किसी वस्तु की कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन के कारण उसकी माँग की मात्रा में कितना प्रतिशत परिवर्तन होता है। यह माँग में होने वाले बदलाव की संवेदनशीलता को मापने का एक पैमाना है।
सूत्र:
$$e_d = \frac{\text{माँग की मात्रा में % परिवर्तन}}{\text{कीमत में % परिवर्तन}}$$
उत्पादन के कोई दो साधन लिखिये ।उत्पादन के दो साधन (Factors of Production)
उत्पादन प्रक्रिया में योगदान देने वाले किन्हीं दो प्रमुख साधनों के नाम इस प्रकार हैं:
श्रम (Labour): उत्पादन में उपयोग की जाने वाली मानवीय शारीरिक या मानसिक शक्ति। इसके बदले 'मजदूरी' दी जाती है।पूँजी (Capital): उत्पादन में उपयोग की जाने वाली मानव-निर्मित वस्तुएँ जैसे मशीनें, औजार और कच्चा माल। इसके बदले 'ब्याज' दिया जाता है।ह्रासमान पैमाने का प्रतिफल का अर्थ लिखिये ।
ह्रासमान पैमाने का प्रतिफल (Decreasing Returns to Scale)
यह दीर्घकाल की एक अवधारणा है। जब उत्पादन के सभी साधनों (जैसे श्रम और पूँजी) को एक निश्चित अनुपात में बढ़ाया जाता है, लेकिन उत्पादन में वृद्धि उस अनुपात से कम होती है, तो इसे 'ह्रासमान पैमाने का प्रतिफल' कहते हैं।
उदाहरण: यदि साधनों को 100% बढ़ाया जाए और उत्पादन केवल 80% ही बढ़े, तो यह ह्रासमान प्रतिफल की स्थिति है। ऐसा आमतौर पर प्रबंधन की कठिनाइयों और तालमेल की कमी के कारण होता है।संप्राप्ति का अर्थ लिखिये ।संप्राप्ति (Revenue)
एक फर्म अपनी उत्पादित वस्तुओं को बाजार में बेचकर जो कुल धनराशि प्राप्त करती है, उसे संप्राप्ति (आगम) कहते हैं। इसे अक्सर 'बिक्री' या 'कुल आय' के रूप में समझा जाता है।
कुल संप्राप्ति ($TR$): वस्तु की कीमत $\times$ बेची गई मात्रा ($P \times Q$)।सामान्य लाभ का अर्थ लिखिये ।सामान्य लाभ (Normal Profit)
सामान्य लाभ वह न्यूनतम लाभ है जो एक उद्यमी को उत्पादन कार्य में बने रहने के लिए आवश्यक होता है। अर्थशास्त्र में इसे लागत का ही एक हिस्सा माना जाता है।
यह वह स्थिति है जहाँ फर्म की कुल संप्राप्ति और कुल लागत बराबर होती है ($TR = TC$)।यदि किसी उद्यमी को सामान्य लाभ भी प्राप्त नहीं होता, तो वह उस व्यवसाय को बंद कर सकता है।समष्टि अर्थशास्त्र का अर्थ लिखिये ।मष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) का अर्थ
समष्टि अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो संपूर्ण अर्थव्यवस्था के स्तर पर आर्थिक समस्याओं और मुद्दों का अध्ययन करती है। यह व्यक्तिगत इकाइयों के बजाय बड़े समूहों का विश्लेषण करता है।
अध्ययन के विषय: राष्ट्रीय आय, कुल रोजगार, सामान्य कीमत स्तर, मुद्रास्फीति, और सरकारी बजट आदि।इसे 'आय और रोजगार का सिद्धांत' भी कहा जाता है।आर्थिक एजेंट को समझाइये ।आर्थिक एजेंट (Economic Agents)
आर्थिक एजेंट उन व्यक्तियों या संस्थाओं को कहा जाता है जो आर्थिक निर्णय लेते हैं। ये निर्णय उपभोग, उत्पादन, निवेश या बचत से संबंधित हो सकते हैं।
प्रमुख एजेंट: * उपभोक्ता: जो तय करते हैं कि क्या और कितना खरीदना है।उत्पादक (फर्म): जो तय करते हैं कि क्या और कितना उत्पादन करना है।सरकार और बैंक: जो कर, निवेश और मौद्रिक नीतियों के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।उपभोग वस्तुओं को समझाइये ।
उपभोग वस्तुएँ (Consumption Goods)
वे वस्तुएँ जो मानवीय आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से संतुष्ट करती हैं और जिनका अंतिम उपभोग किया जाता है, उपभोग वस्तुएँ कहलाती हैं। इन्हें दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
टिकाऊ वस्तुएँ: जैसे टी.वी., फ्रिज, कार (जो लंबे समय तक चलती हैं)।गैर-टिकाऊ वस्तुएँ: जैसे दूध, ब्रेड, सब्जियां (जो एक ही बार के उपयोग में समाप्त हो जाती हैं)।पूँजीगत वस्तुओं को समझाइये ।पूँजीगत वस्तुएँ (Capital Goods)
पूँजीगत वस्तुएँ वे स्थिर संपत्तियाँ होती हैं जिनका उपयोग उत्पादन प्रक्रिया में अन्य वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन के लिए किया जाता है।
ये वस्तुएँ स्वयं उपभोग के लिए नहीं होतीं, बल्कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के काम आती हैं।उदाहरण: कारखाने की मशीनें, ट्रैक्टर, उपकरण और औद्योगिक इमारतें। इनमें समय के साथ मूल्यह्रास (Depreciation) होता है।मुद्रा की माँग का अर्थ लिखिये ।मुद्रा की माँग (Demand for Money)
मुद्रा की माँग का अर्थ है कि लोग अपनी संपत्ति का कितना हिस्सा नकदी (Liquidity) के रूप में अपने पास रखना चाहते हैं। कीन्स के अनुसार, लोग तीन मुख्य उद्देश्यों के लिए मुद्रा की माँग करते हैं:
लेन-देन उद्देश्य: दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए।सावधानी उद्देश्य: भविष्य की अनिश्चितताओं या आपात स्थिति के लिए।सट्टा उद्देश्य: बाजार में ब्याज दरों में बदलाव से लाभ कमाने के लिए।मुद्रा की पूर्ति का अर्थ लिखिये ।मुद्रा की पूर्ति (Supply of Money)
मुद्रा की पूर्ति से अभिप्राय एक निश्चित समय पर किसी अर्थव्यवस्था में जनता के पास उपलब्ध कुल मुद्रा की मात्रा से है। यह एक 'स्टॉक' अवधारणा है। इसमें मुख्य रूप से दो चीजें शामिल होती हैं:
लोगों के पास उपलब्ध नोट और सिक्के (Currency)।व्यावसायिक बैंकों में जमा 'मांग जमा' (Demand Deposits)।भारत में इसे $M_1, M_2, M_3$ और $M_4$ के रूप में मापा जाता है।विमुद्रीकरण को समझाइये ।
विमुद्रीकरण (Demonetization)
विमुद्रीकरण वह आर्थिक प्रक्रिया है जिसमें सरकार किसी प्रचलित मुद्रा को कानूनी तौर पर अवैध घोषित कर देती है। इसके बाद वे पुराने नोट लेनदेन के लिए स्वीकार नहीं किए जाते।
उद्देश्य: काले धन पर रोक लगाना, भ्रष्टाचार को कम करना, नकली नोटों के प्रसार को रोकना और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।उदाहरण: भारत में 8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये के नोटों का विमुद्रीकरण किया गया थासट्टा उद्देश्य को समझाइये ।सट्टा उद्देश्य (Speculative Motive)
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे.एम. कीन्स के अनुसार, लोग अपनी संपत्ति को नकदी के रूप में इसलिए भी रखते हैं ताकि वे भविष्य में ब्याज दर या बांड की कीमतों में होने वाले बदलाव से लाभ कमा सकें।
यदि लोगों को लगता है कि भविष्य में ब्याज दरें बढ़ेंगी (और बांड की कीमतें गिरेंगी), तो वे आज नकदी अपने पास रखना पसंद करेंगे ताकि बाद में सस्ते में निवेश कर सकें।यह ब्याज दर और मुद्रा की मांग के बीच विपरीत संबंध को दर्शाता है।समग्र माँग क्या है?
समग्र माँग (Aggregate Demand - AD)
एक लेखा वर्ष के दौरान किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं पर किए जाने वाले कुल नियोजित व्यय (Total Planned Expenditure) को समग्र माँग कहते हैं।
इसके प्रमुख अवयव हैं: उपभोग ($C$) + निवेश ($I$) + सरकारी व्यय ($G$) + शुद्ध निर्यात ($X-M$)।समग्र पूर्ति क्या है?समग्र पूर्ति (Aggregate Supply - AS)
समग्र पूर्ति से अभिप्राय एक अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य से है, जिसे उत्पादक एक निश्चित समय में बेचने के लिए तैयार होते हैं।
सरल शब्दों में, यह देश की राष्ट्रीय आय ($Y$) के बराबर होती है।इसके दो मुख्य भाग होते हैं: उपभोग ($C$) और बचत ($S$)। अतः $AS = C + S$।सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) का अर्थ लिखिये ।
सीमांत बचत प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Save - MPS)
आय में होने वाले परिवर्तन के कारण बचत में होने वाले परिवर्तन के अनुपात को सीमांत बचत प्रवृत्ति कहते हैं। यह बताता है कि अतिरिक्त आय का कितना हिस्सा बचाया जा रहा है।
सूत्र:
$$MPS = \frac{\Delta S}{\Delta Y}$$
(यहाँ $\Delta S = \text{बचत में परिवर्तन}$ और $\Delta Y = \text{आय में परिवर्तन}$)
विशेष: $MPC + MPS = 1$ होता है।औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC) का अर्थ लिखिये ।
औसत उपभोग प्रवृत्ति (Average Propensity to Consume - APC)
कुल आय के एक निश्चित स्तर पर कुल उपभोग और कुल आय के अनुपात को औसत उपभोग प्रवृत्ति कहते हैं। यह बताता है कि आय का कितना प्रतिशत हिस्सा उपभोग पर खर्च किया जा रहा है।
सूत्र:
$$APC = \frac{C}{Y}$$
(यहाँ $C = \text{कुल उपभोग}$ और $Y = \text{कुल आय}$)
सरकारी बजट का अर्थ लिखिये ।
सरकारी बजट (Government Budget)
सरकारी बजट एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के दौरान सरकार की अनुमानित प्राप्तियों (आय) और अनुमानित व्यय (खर्च) का एक वार्षिक वित्तीय विवरण होता है। यह सरकार की आर्थिक नीतियों और प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
राजस्व व्यय का अर्थ लिखिये ।राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)
सरकार का वह खर्च जिससे न तो किसी परिसंपत्ति (Asset) का निर्माण होता है और न ही सरकार की देयता (Liability) में कोई कमी आती है, राजस्व व्यय कहलाता है। यह सरकार के प्रशासनिक कार्यों के संचालन के लिए आवश्यक होता है।
उदाहरण: सरकारी कर्मचारियों का वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी।सीमांत उत्पादन संभावना क्या है?सीमांत उत्पादन संभावना (Marginal Opportunity Cost / MRT)
इसे सीमांत रूपांतरण दर ($MRT$) भी कहा जाता है। एक वस्तु ($X$) की एक अतिरिक्त इकाई प्राप्त करने के लिए दूसरी वस्तु ($Y$) की जितनी मात्रा का त्याग करना पड़ता है, उसे ही सीमांत उत्पादन संभावना या सीमांत अवसर लागत कहते हैं।
यह उत्पादन संभावना वक्र ($PPC$) के ढाल को निर्धारित करता है।
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण से आपका क्या अभिप्राय है?सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण (Positive Economic Analysis)
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण के अंतर्गत "क्या है" (What is) का अध्ययन किया जाता है। यह तथ्यों, आंकड़ों और कार्य-कारण संबंधों पर आधारित होता है।
इसमें कोई नैतिक निर्णय या सुझाव (जैसे- क्या होना चाहिए) नहीं दिया जाता।इसके कथनों की सत्यता की जांच वास्तविक आंकड़ों से की जा सकती है।उदाहरण: "भारत की जनसंख्या वर्तमान में इतनी है" या "ब्याज दर बढ़ने पर निवेश घटता है।" ये केवल वस्तुस्थिति का वर्णन करते हैं।बाज़ार संतुलन की व्याख्या कीजिये ।बाज़ार संतुलन (Market Equilibrium)
बाज़ार संतुलन वह स्थिति है जहाँ किसी वस्तु की माँग की मात्रा ($D$) और उसकी पूर्ति की मात्रा ($S$) एक-दूसरे के बिल्कुल बराबर हो जाती है।
संतुलन कीमत: जिस कीमत पर माँग और पूर्ति बराबर हों।संतुलन मात्रा: वह मात्रा जो संतुलन कीमत पर खरीदी और बेची जाती है।यदि माँग पूर्ति से अधिक हो, तो कीमतें बढ़ती हैं। यदि पूर्ति माँग से अधिक हो, तो कीमतें गिरती हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक संतुलन पुनः प्राप्त न हो जाए।एक स्थिर संख्या के होने पर पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत का निर्धारण किस प्रकार होता है? व्याख्या कीजिए ।पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत निर्धारण (फर्मों की संख्या स्थिर होने पर)
जब बाज़ार में फर्मों की संख्या स्थिर होती है, तो कीमत का निर्धारण बाज़ार माँग वक्र और बाज़ार पूर्ति वक्र के प्रतिच्छेदन (Intersection) द्वारा होता है।
बाज़ार माँग: सभी व्यक्तिगत उपभोक्ताओं की माँग का योग।बाज़ार पूर्ति: सभी स्थिर संख्या वाली फर्मों की व्यक्तिगत पूर्ति का योग।जिस बिंदु पर कुल माँग और कुल पूर्ति बराबर होती है, वहाँ 'संतुलन कीमत' निर्धारित होती है। पूर्ण प्रतिस्पर्धा में प्रत्येक फर्म इस कीमत को 'स्वीकार' (Price Taker) करती है और अपनी उत्पादन मात्रा तय करती है।"प्रभावी माँग" क्या है?प्रभावी माँग (Effective Demand)
प्रभावी माँग का सिद्धांत जे.एम. कीन्स द्वारा दिया गया था। समग्र माँग का वह स्तर जहाँ वह समग्र पूर्ति के बराबर हो जाती है, 'प्रभावी माँग' कहलाती है।
महत्व: कीन्स के अनुसार, एक अर्थव्यवस्था में आय और रोजगार का स्तर इसी प्रभावी माँग पर निर्भर करता है।यदि प्रभावी माँग कम है, तो अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी बढ़ेगी। इसे बढ़ाकर ही मंदी की स्थिति से निकला जा सकता है।सूत्र: $AD = AS$ (संतुलन बिंदु पर)।'मितव्ययता के विरोधाभास' की व्याख्या कीजिए ।
मितव्ययिता का विरोधाभास (Paradox of Thrift)
यह सिद्धांत बताता है कि जो बात एक व्यक्ति के लिए सही है, वह पूरी अर्थव्यवस्था के लिए गलत हो सकती है।
व्याख्या: व्यक्तिगत स्तर पर बचत करना अच्छी बात है। लेकिन यदि अर्थव्यवस्था के सभी लोग एक साथ अपनी बचत बढ़ा दें, तो उपभोग व्यय (Consumption) कम हो जाएगा।उपभोग कम होने से बाज़ार में वस्तुओं की माँग घटेगी, जिससे उत्पादन और रोजगार कम होंगे। अंततः लोगों की आय गिर जाएगी और आय गिरने से कुल बचत भी कम हो जाएगी।निष्कर्ष: बचत बढ़ाने की सामूहिक कोशिश अंत में कुल बचत को ही घटा देती है।खुली अर्थव्यवस्था स्वायत्त व्यय गुणक बंद अर्थव्यवस्था के गुणक की तुलना में छोटा क्यों होता है?खुली अर्थव्यवस्था का गुणक बंद अर्थव्यवस्था से छोटा क्यों होता है?
एक खुली अर्थव्यवस्था में 'स्वायत्त व्यय गुणक' (Multiplier) का मान बंद अर्थव्यवस्था की तुलना में छोटा होता है, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
आयात का रिसाव (Leakage): बंद अर्थव्यवस्था में जब आय बढ़ती है, तो वह पूरी तरह घरेलू वस्तुओं पर खर्च होती है। लेकिन खुली अर्थव्यवस्था में आय का एक हिस्सा विदेशी वस्तुओं (आयात) को खरीदने में खर्च हो जाता है।माँग का बाहर जाना: आयात पर किया गया खर्च घरेलू उत्पादन और आय को नहीं बढ़ाता, बल्कि विदेशों की आय बढ़ाता है। इसे आय के चक्रीय प्रवाह में एक 'रिसाव' माना जाता है।सीमांत आयात प्रवृत्ति (MPM): आय बढ़ने पर आयात बढ़ने की दर जितनी अधिक होगी, गुणक का प्रभाव उतना ही कम (छोटा) होगा।विनिमय दर के निर्धारण के कोई तीन बिंदु लिखिए ।विनिमय दर निर्धारण के तीन मुख्य बिंदु
विदेशी विनिमय दर (Foreign Exchange Rate) का निर्धारण मुख्य रूप से बाजार की शक्तियों द्वारा होता है:
विदेशी मुद्रा की माँग: जब हम विदेशों से आयात करते हैं या वहां निवेश करते हैं, तो हमें विदेशी मुद्रा की जरूरत होती है। माँग बढ़ने पर विदेशी मुद्रा महँगी हो जाती है।विदेशी मुद्रा की पूर्ति: जब हम निर्यात करते हैं या विदेशी लोग हमारे देश में निवेश करते हैं, तो देश में विदेशी मुद्रा आती है। पूर्ति बढ़ने पर विदेशी मुद्रा सस्ती हो जाती है।बाजार संतुलन: जहाँ विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति एक-दूसरे को काटती हैं, वहीं 'संतुलन विनिमय दर' निर्धारित होती है।एक वस्तु की माँग पर विचार करें। 4 रुपये की कीमत पर इस वस्तु की 25 इकाइयों की माँग है। मान लीजिए वस्तु की कीमत बढ़कर 5 रुपये हो जाती है तथा परिणामस्वरूप वस्तु की माँग घटकर 20 इकाइयां हो जाती है। कीमत लोच की गणना कीजिये ।माँग की कीमत लोच की गणना
दिया गया है:
प्रारंभिक कीमत ($P_1$) = 4, नई कीमत ($P_2$) = 5 $\rightarrow$ परिवर्तन ($\Delta P$) = $5 - 4 = 1$प्रारंभिक माँग ($Q_1$) = 25, नई माँग ($Q_2$) = 20 $\rightarrow$ परिवर्तन ($\Delta Q$) = $20 - 25 = -5$सूत्र: $E_d = \frac{\Delta Q}{\Delta P} \times \frac{P_1}{Q_1}$
गणना:
$$E_d = \frac{-5}{1} \times \frac{4}{25}$$
$$E_d = -5 \times 0.16 = -0.8$$
उत्तर: माँग की लोच 0.8 है। चूंकि यह 1 से कम है, इसलिए यह वेलोचदार माँग की स्थिति है।
एक ऐसे बाज़ार को लीजिए, जहाँ केवल दो उपभोक्ता हैं तथा मान लीजिए वस्तु के लिए उनकी माँग इस प्रकार हैं। वस्तु के लिए बाज़ार माँग की गणना कीजिए ।
बाजार माँग की गणना (दो उपभोक्ताओं की स्थिति में)
बाजार माँग, सभी व्यक्तिगत उपभोक्ताओं की माँग का क्षैतिज योग (Horizontal Summation) होती है।
यदि आपके पास तालिका (Table) में डेटा है, तो आप इसे इस प्रकार जोड़ेंगे:
मान लीजिए: किसी निश्चित कीमत पर उपभोक्ता A की माँग $d_A$ है और उपभोक्ता B की माँग $d_B$ है।बाजार माँग ($D_M$): $d_A + d_B$उदाहरण: यदि ₹10 की कीमत पर A, 5 इकाई माँगता है और B, 10 इकाई, तो बाजार माँग $5 + 10 = 15$ इकाइयाँ होगी।किसी फर्म के पूर्ति वक्र को निर्धारित करने वाले किन्हीं चार तत्वों का वर्णन कीजिए ।पूर्ति वक्र को निर्धारित करने वाले चार तत्वकिसी फर्म का पूर्ति वक्र (Supply Curve) निम्नलिखित कारकों द्वारा निर्धारित होता है:तकनीकी उन्नति: बेहतर तकनीक से उत्पादन लागत कम होती है, जिससे फर्म उसी कीमत पर अधिक पूर्ति करने को तैयार होती है (पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसकता है)।आगतों (Input) की कीमतें: यदि कच्चा माल या श्रम महँगा हो जाए, तो लाभ कम होगा और फर्म पूर्ति घटा देगी।इकाई कर (Unit Tax): सरकार द्वारा लगाए गए कर लागत बढ़ाते हैं, जिससे पूर्ति कम हो जाती है।फर्म का लक्ष्य: यदि फर्म का लक्ष्य 'लाभ अधिकतम' करना है, तो वह कीमत बढ़ने पर ही पूर्ति बढ़ाएगी, लेकिन यदि लक्ष्य 'बिक्री अधिकतम' करना है, तो वह कम लाभ पर भी अधिक पूर्ति कर सकती है।लाभ अधिकतमीकरण किसे कहते हैं?
लाभ अधिकतमीकरण (Profit Maximization)एक फर्म का मुख्य उद्देश्य अपने लाभ को अधिकतम करना होता है। लाभ अधिकतमीकरण से आशय उत्पादन के उस स्तर को चुनने से है, जहाँ फर्म की कुल संप्राप्ति (TR) और कुल लागत (TC) के बीच का अंतर सबसे अधिक हो।इसकी तीन आवश्यक शर्तें:सीमांत लागत = सीमांत संप्राप्ति ($MC = MR$): उत्पादन के उस बिंदु पर जहाँ $MC$ और $MR$ एक-दूसरे के बराबर हों।MC वक्र MR वक्र को नीचे से काटे: संतुलन बिंदु पर सीमांत लागत बढ़ती हुई होनी चाहिए।कीमत और औसत लागत का संबंध: * अल्पकाल में, कीमत ($P$) कम से कम औसत परिवर्तनशील लागत ($AVC$) के बराबर होनी चाहिए।दीर्घकाल में, कीमत ($P$) कम से कम औसत लागत ($AC$) के बराबर होनी चाहिए।मुद्रा के किन्हीं चार कार्यों को लिखिए ।मुद्रा के चार प्रमुख कार्य
मुद्रा अर्थव्यवस्था में मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य करती है:
विनिमय का माध्यम: वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने और बेचने के लिए मुद्रा एक माध्यम के रूप में कार्य करती है, जिससे वस्तु-विनिमय की समस्याएँ दूर हो जाती हैं।मूल्य का मापक: यह सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को एक समान इकाई (जैसे ₹) में मापने का आधार प्रदान करती है।मूल्य का संचय: मुद्रा को भविष्य के लिए आसानी से बचाकर (बचत के रूप में) रखा जा सकता है क्योंकि यह खराब नहीं होती।भावी भुगतान का आधार: भविष्य में किए जाने वाले भुगतानों और ऋणों के लेन-देन को मुद्रा ने अत्यंत सरल बना दिया है।भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति के कौन-कौन से उपकरण हैं?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति के उपकरण
बाजार में मुद्रा की आपूर्ति और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए RBI दो प्रकार के उपकरणों का उपयोग करता है:
क) मात्रात्मक उपकरण:
रेपो रेट (Repo Rate): वह दर जिस पर RBI बैंकों को ऋण देता है।नकद आरक्षित अनुपात (CRR): बैंकों को अपनी जमा का एक हिस्सा RBI के पास रखना पड़ता है।वैधानिक तरलता अनुपात (SLR): बैंकों को अपने पास सुरक्षित तरल संपत्ति रखनी पड़ती है।खुले बाजार की क्रियाएं (OMO): सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री।ख) गुणात्मक उपकरण:
सीमान्त आवश्यकता (Margin Requirement) में बदलाव।नैतिक दबाव (Moral Suasion)।हम कब कहते हैं कि बाजार में किसी वस्तु के लिए : (1) अधिमांग है? (2) अधिपूर्ति है ?अधिमाँग और अधिपूर्ति की स्थिति
अधिमाँग (Excess Demand): हम तब कहते हैं कि बाजार में अधिमाँग है जब प्रचलित कीमत पर माँग की मात्रा ($Q_d$), पूर्ति की मात्रा ($Q_s$) से अधिक हो जाती है ($Q_d > Q_s$)। यह स्थिति तब आती है जब बाजार मूल्य संतुलन कीमत से कम हो।अधिपूर्ति (Excess Supply): हम तब कहते हैं कि बाजार में अधिपूर्ति है जब प्रचलित कीमत पर पूर्ति की मात्रा ($Q_s$), माँग की मात्रा ($Q_d$) से अधिक हो जाती है ($Q_s > Q_d$)। यह स्थिति तब आती है जब बाजार मूल्य संतुलन कीमत से अधिक हो।क्या होगा यदि बाजार में प्रचलित मूल्य है : (1) संतुलन कीमत से अधिक ? (2) संतुलन कीमत से कम ?बाजार मूल्य का संतुलन पर प्रभाव
यदि प्रचलित मूल्य संतुलन कीमत से अधिक है:बाजार में अधिपूर्ति (Surplus) की स्थिति पैदा होगी।विक्रेताओं के बीच प्रतियोगिता बढ़ेगी क्योंकि माल नहीं बिक रहा होगा।परिणामस्वरूप, विक्रेता अपनी कीमतें घटाएंगे और यह प्रक्रिया तब तक चलेगी जब तक बाजार पुनः 'संतुलन कीमत' पर न पहुँच जाए।यदि प्रचलित मूल्य संतुलन कीमत से कम है:बाजार में अधिमाँग (Shortage) की स्थिति पैदा होगी।खरीदारों के बीच माल पाने की होड़ मचेगी।परिणामस्वरूप, वस्तुओं की कीमतें बढ़ना शुरू होंगी और यह तब तक बढ़ेंगी जब तक कि बाजार वापस 'संतुलन' पर न आ जाए।किन्हीं ऐसी चार आवश्यक वस्तुओं के नाम लिखिये, जिन पर भारत में उच्चतम निर्धारित कीमत लागू है।उच्चतम निर्धारित कीमत (Price Ceiling) वाली चार वस्तुएँ
भारत में आम आदमी के हितों और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सरकार इन प्रमुख वस्तुओं पर उच्चतम निर्धारित कीमत लागू करती है:
जीवन रक्षक दवाएं (Essential Medicines): जैसे इंसुलिन, हृदय रोग और कैंसर की दवाएं।उर्वरक (Fertilizers): विशेषकर यूरिया, ताकि किसानों को सस्ती दरों पर खाद मिल सके।खाद्यान्न (Public Distribution System): राशन की दुकानों पर मिलने वाला गेहूं, चावल और मिट्टी का तेल।प्राकृतिक गैस और रसोई गैस (LPG): घरेलू उपयोग के लिए गैस सिलेंडरों की दरें।निम्नतम निर्धारित कीमत के सुपरिचित उदाहरण दीजिये।निम्नतम निर्धारित कीमत (Price Floor) के उदाहरण
निम्नतम निर्धारित कीमत का उद्देश्य उत्पादकों (किसानों और श्रमिकों) को न्यूनतम आय की गारंटी देना है। इसके प्रमुख उदाहरण हैं:
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): भारत सरकार द्वारा गेहूं, धान और गन्ने जैसी फसलों के लिए घोषित न्यूनतम मूल्य।न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage): अकुशल और कुशल श्रमिकों के लिए सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम दैनिक या मासिक मजदूरी।सरल अर्थव्यवस्था में आय के वर्तुल प्रवाह का रैखिक नामांकित आरेख बनाइये।आय का वर्तुल प्रवाह (Circular Flow of Income)
एक सरल अर्थव्यवस्था (दो-क्षेत्रीय मॉडल: परिवार और फर्म) में आय का प्रवाह इस प्रकार होता है:
परिवार (Households): फर्मों को साधन सेवाएँ (श्रम, भूमि) देते हैं और बदले में पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं।फर्म (Firms): परिवारों को वस्तुएँ और सेवाएँ प्रदान करती हैं और बदले में उपभोग व्यय प्राप्त करती हैं।निम्नलिखित के पूर्ण नाम लिखिये : (1) G.D.P. (2) N.D.P. (3) W.P.I. (4) C.P.I.महत्वपूर्ण संक्षिप्त नाम (Full Forms)
G.D.P. - Gross Domestic Product (सकल घरेलू उत्पाद)N.D.P. - Net Domestic Product (शुद्ध घरेलू उत्पाद)W.P.I. - Wholesale Price Index (थोक मूल्य सूचकांक)C.P.I. - Consumer Price Index (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक)माल-सूची को परिभाषित कीजिए। उत्पादन के कारकों के नाम एवं उनके पारिश्रमिक लिखिए।उत्पादन के कारक (Factors)
पारिश्रमिक (Reward)
भूमि (Land)
लगान या किराया (Rent)
श्रम (Labour)
मजदूरी या वेतन (Wages)
पूँजी (Capital)
ब्याज (Interest)
उद्यमी (Entrepreneur)
लाभ (Profit)
माल-सूची (Inventory) और उत्पादन के कारक
माल-सूची की परिभाषा:
किसी फर्म के पास एक निश्चित समय पर बिना बिकी हुई तैयार वस्तुओं, अर्द्ध-निर्मित वस्तुओं और कच्चे माल के भंडार को 'माल-सूची' कहा जाता है। यह एक स्टॉक अवधारणा है।
राष्ट्रीय आय गणना की आय विधि के कोई चार घटकों के नाम लिखिये।
राष्ट्रीय आय गणना की आय विधि के चार घटक
आय विधि (Income Method) के अंतर्गत राष्ट्रीय आय की गणना करते समय उत्पादन के साधनों द्वारा अर्जित आय को जोड़ा जाता है। इसके चार मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:
कर्मचारियों का पारिश्रमिक: इसमें वेतन, मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में मालिकों का योगदान शामिल है।लगान या किराया (Rent): भूमि और इमारतों के उपयोग के बदले प्राप्त आय।ब्याज (Interest): उत्पादन कार्यों के लिए उपयोग की गई पूँजी पर प्राप्त प्रतिफल।लाभ (Profit): इसमें लाभांश, निगम कर और अवितरित लाभ शामिल होते हैं जो उद्यमी को प्राप्त होते हैं।स्टॉक एवं प्रवाह को परिभाषित कीजिए।स्टॉक एवं प्रवाह (Stock and Flow)
स्टॉक (Stock): स्टॉक वह मात्रा है जिसे समय के एक निश्चित बिंदु (Point of Time) पर मापा जाता है। इसका कोई समय काल नहीं होता।उदाहरण: बैंक खाते में जमा राशि (जैसे 1 जनवरी को ₹10,000), गोदाम में रखा अनाज।प्रवाह (Flow): प्रवाह वह मात्रा है जिसे समय की एक निश्चित अवधि (Period of Time) के दौरान मापा जाता है।उदाहरण: मासिक वेतन, नदी का बहता पानी, प्रति माह होने वाला खर्च।- भारतीय रिजर्व बैंक के कोई दो कार्य लिखिए।
- सीमांत उपभोग प्रवृत्ति क्या है ?
- एक दिष्ट अधिमान क्या है ?
- उपयोगिता के कोई दो लक्षण लिखिये।
- अनधिमान वक्रों के कोई दो लक्षण लिखिये।
- बजट सेट को परिभाषित कीजिए।
- पैमाने के प्रतिफल को परिभाषित कीजिए।
- फर्म का लाभ किसे कहते हैं?
- अवसर लागत को परिभाषित कीजिए।
- पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की कोई दो विशेषताएँ लिखिये।
- भुगतान संतुलन के चालू खाते की कोई तीन मदों एवं पूँजीगत खाते की कोई तीन मदों के नाम लिखिये।
- विदेशी विनिमय दर को प्रभावित करने वाले कोई तीन तत्वों का वर्णन कीजिये।
- अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय समस्याओं की विवेचना कीजिये।
- केन्द्रीय कृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था एवं बाज़ार अर्थव्यवस्था में कोई तीन भेद कीजिये।
- मान लीजिये कोई उपभोक्ता अपनी संपूर्ण आय को व्यय करके वस्तु X की 6 इकाइयाँ तथा वस्तु Y की 8 इकाइयाँ खरीद सकता है। दोनों वस्तुओं की कीमतें क्रमशः 8 ₹ एवं 6 ₹ है। उपभोक्ता की आय की गणना कीजिए।
- सार्वजनिक वस्तु सरकार के द्वारा ही प्रदान की जानी चाहिये, क्यों? व्याख्या कीजिये।
- सरकारी बजट के किन्हीं तीन उद्देश्यों की व्याख्या कीजिये।
- आय एवं रोजगार के परंपरावादी सिद्धांत एवं कीन्स के सिद्धांत में कोई चार अंतर लिखिये।
- अत्यधिक मांग एवं अभावी मांग में कोई चार अंतर लिखिये।
- मांग के नियम के कोई चार अपवादों की विवेचना कीजिये।
- मांग की कीमत लोच की श्रेणियों के नाम लिखते हुए, किसी एक श्रेणी की सचित्र व्याख्या कीजिये।
- भारत सरकार द्वारा 2016 में किये गये "विमुद्रीकरण" के सकारात्मक प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
- व्यापारिक बैंकों के कार्यों की विवेचना कीजिए।
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