कोरोना की रोकथाम और लॉकडाउन पालन में भारतीय कुटुंब व्यवस्था की भूमिका –

 कोरोना की रोकथाम और लॉकडाउन पालन में भारतीय कुटुंब व्यवस्था की भूमिका –

लेखक – शक्ति पटेल

शीतला वार्ड , मांद,

तहसील – बिछिया , जिला – मंडला (मध्यप्रदेश)

मोबाइल – 9424783306

 

            कोरोना जनित संकट समूचे विश्व में छाया हुआ है और यह लगातार अपने पैर पसारता जा रहा है। भारत में भी इसका तीव्र गति से प्रसार हो रहा है ; परंतु शासन के प्रयासों से अन्य देशों की तुलना में यह काफी मात्रा में नियंत्रित है ।

            कोरोना से बचाव के लिए शासन द्वारा जो प्रयास किए जा रहे हैं अर्थात जनता को जो दिशानिर्देश प्रसारित किए जा रहे हैं, वे कोरोना को नियंत्रित करने में अति महत्वपूर्ण हैं । ये प्रयास रोगों व संक्रमण की रोकथाम के लिए भारतीय कुटुंब व्यवस्था द्वारा आदि समय से ही अपनाए जा रहे हैं । दूसरे शब्दों में कहें , तो ये प्रयास भारतीयों के लिए नवीन नहीं हैं। यही कारण है कि प्रतिशतता की दृष्टि से भारत में कोरोना के मामले अन्य देशों की तुलना में काफी कम हैं ।

            भारतीय कुटुंब व्यवस्था में जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत जो भी अनुष्ठान या क्रियाकर्म किए जाते हैं , उनमें बीमारियों से बचने के कार्यकलाप भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल होते है ।

            जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तो भारतीय कुटुंब व्यवस्था में बनाई गई ‘सोबर’ व्यवस्था का उस कुटुंब के लोगों को पालन करना होता है। इसके अंतर्गत पूजन कक्ष में प्रवेश न करना, मूर्तियों को स्पर्श न करना, क्षौरकर्म न करना आदि का विधान है। इन कार्यों का उद्देश्य संक्रमण से बचाव करना और सकारात्मक ऊर्जा का संरक्षण करना है। चूंकि मूर्तियों में सकारात्मक ऊर्जा निहित होती है,अतः इस अवधि में प्रयास किया जाता है, कि सकारात्मक ऊर्जा का स्तर हमेशा बना रहे । क्षौरकर्म की यदि हम बात करें तो इसके अंतर्गत उपयोग किए जाने वाले उपकरणों से रक्त निकलने की संभावना रहती है और संक्रमण का जोखिम और बढ़ जाता है । विशेष रूप से त्वचा संबन्धित रोगों के फैलने की संभावना प्रबल होती है ।

            जब व्यक्ति का जन्म होता है, तो शिशु और उसकी माँ की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। अतः उनसे मिलने आए हुए व्यक्ति को हाथ – पैर – मुंह धुलना अनिवार्य माना जाता है । यह क्रिया वर्तमान सेनीटाइजिंग की प्रक्रिया का ही एक स्वरूप है  ।

            जब कोई व्यक्ति बाहर से घर पर या कोई मेहमान घर पर आता है, तो उसको दरवाजे पर ही हाथ-  पैर धोने के लिए पानी दिया जाता है; तत्पश्चात आगंतुक व्यक्ति घर में प्रवेश करता है ताकि उसके साथ आए हुए विषाणु, कीटाणु सब बाहर ही रह जाएँ और वे किसी के संपर्क में न आएँ । भोजन करने के पहले तथा बाद में हाथ धोना , प्रतिदिन स्नान कर पूजन करना आदि सभी में संक्रमण से बचने के भाव निहित हैं ।

            तुलसी के पत्ते, गाय का दूध, हल्दी का सेवन, योग-ध्यान-पूजन के समय घंटी बजाना, मंत्रजाप इत्यादि के कंपन से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है । माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर भारतवासियों ने घंटी और थाली बजाकर कोरोना फाइटर्स का उत्साहवर्धन व सम्मान किया; वह इसी प्रणाली का ही एक रूप है। दूसरा पक्ष यह भी है कि जब कोई कर्मी अपनी सेवा देने के लिए अपने सेवाक्षेत्र को गमन करता है, तो परिवार में माताएँ, बहिनें, पत्नी उसको तिलक लगाकर,आरती उतारकर और मिठाई खिलाकर उसे विदा करती हैं । कुटुंब व्यवस्था में अनुष्ठानों के समय शंख बजाने का भी विधान है । इससे विषाणुओं का नाश होता है । भारतीय कुटुंब व्यवस्था में शुभ अवसरों पर दीपक भी अनिवार्य रूप से प्रज्ज्वलित किए जाते हैं । इनसे निकालने वाली रोशनी नकारात्मक ऊर्जा और विषाणुओं को नष्ट करने में कारगर होती है । माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के आह्वान पर हम देशवासियों ने दीपक भी प्रज्वलित किया ।

            जब कोई व्यक्ति इस संसार से परलोक गमन करता है, तब उसके संबंधी पूर्ण रूप से 10 दिनों तक एवं शिथिल रूप से 3 दिनों तक इस प्रकार कुल मिलाकर 13 दिनों तक सूतक में रहते हैं । तेरह दिनों के पश्चात उन्हें शुद्ध हुआ माना जाता है । ये सम्पूर्ण कार्यकलाप संक्रमण से बचने के लिए ही पुरातन समय से संपादित किए जाते रहे हैं । व्यक्ति के मृत शरीर में बहुत से हानिकारक विषाणु होते हैं । चूंकि मृत व्यक्ति के संबंधी उसके संपर्क में आते हैं , अतः उनमें संक्रमण की संभावना रहती है । अतः समाज में यह समुचित माना गया , कि लगभग 10 – 14 दिन संबंधी व्यक्ति समाज के अन्य लोगों के संपर्क में न आएँ । जो व्यक्ति मुखाग्नि देने वाला होता है , उसका संपर्क सर्वाधिक रूप से मृत शरीर से होता है , इसीलिए उसे इन नियमों का अधिक पालन करना होता है । उसे सभी व्यक्तियों से पूर्णतः शारीरिक दूरी बनाए रखना होता है । इसे ही ‘फिजिकल डिस्टेन्सिंग’ की संज्ञा दी जाती है । चूंकि इस दौरान मृत व्यक्ति के परिवार वाले अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी नहीं कर सकते , अतः इस अवधारणा को ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ कहा गया है । इस प्रकार लोगों से शारीरिक दूरी बनाए रखना , सामाजिक कार्यक्रमों में भाग न लेना, एक दूसरे की सामग्री का उपयोग न करना इत्यादि को ही शासकीय प्रोटोकाल में ‘क्वारंटाइन’ की उपमा दी गई है । क्वारंटाइन की प्रक्रिया संक्रमण से बचाव के लिए अति उपयोगी है, जो कि हमारी भारतीय कुटुंब व्यवस्था का एक अति महत्वपूर्ण भाग है ।

            कोरोना काल के प्रोटोकाल पर भी यदि हम ध्यान दें, तो हम पाएंगे कि कोरोना से संक्रमण की आशंका वाले व्यक्ति को भी लगभग 2 सप्ताह (14 दिन) क्वारंटाइन रखा जाता है; इसके बाद ही उसे अन्य व्यक्ति के संपर्क में आने की छूट दी जाती है ।

            समग्र रूप से देखा जाए, तो भारतीय कुटुंब व्यवस्था में जो नियम निर्धारित किए गए हैं और कार्यकलाप संपादित किए जाते हैं ; वे कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए अत्यधिक प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं । यदि इसी प्रकार नियमों का पालन सभी भारतवासी और विश्ववासी करें , तो कोरोना से विजय निश्चित रूप से प्राप्त कर सकेंगे । समग्र विश्व ‘कोरोना मुक्त’ हो , मेरी अनंत शुभकामनाएँ ।

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