हरिवंश राय बच्चन (1907–2003)
आधुनिक हिंदी साहित्य के 'उत्तर छायावाद' काल के सबसे प्रतिष्ठित कवियों में से एक हैं। उन्हें मुख्य रूप से उनकी कालजयी कृति 'मधुशाला' और हिंदी साहित्य में 'हालावाद' के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है। बच्चन जी की लेखन शैली बहुत ही सरल, सुबोध और सीधे दिल को छू लेने वाली थी। उन्होंने जटिल दर्शन को भी आम आदमी की भाषा में पिरोया।
- जन्म: 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के बाबूपट्टी गाँव में हुआ था।
- निधन: 18 जनवरी 2003 को मुंबई में हुआ।
- शिक्षा: उनकी शुरुआती शिक्षा प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुई। बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य (कवि डब्लू.बी. यीट्स पर शोध) में Ph.D. की उपाधि प्राप्त की। वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में Ph.D. करने वाले पहले भारतीय थे।
- व्यवसाय: वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे और बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया। उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया था।
- गाँव: बाबूपट्टी (यह वर्तमान में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के अंतर्गत आता है)।
- पृष्ठभूमि: उनका जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव और माता का नाम सरस्वती देवी था।
- बचपन का नाम: उन्हें बचपन में प्यार से 'बच्चन' (जिसका अर्थ 'बच्चा' या 'संतान' होता है) कहकर पुकारा जाता था। आगे चलकर उन्होंने इसी नाम को अपना उपनाम (Surname) बना लिया और वे 'श्रीवास्तव' की जगह 'बच्चन' के नाम से ही जगत प्रसिद्ध हुए।
- यद्यपि उनका जन्म बाबूपट्टी गाँव में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण और प्रारंभिक जीवन मुख्य रूप से प्रयागराज (इलाहाबाद) के कटघर इलाके में बीता, जहाँ उनके पिता काम के सिलसिले में बस गए थे। यही कारण है कि बच्चन जी के साहित्य और स्मृतियों में इलाहाबाद का गहरा प्रभाव मिलता है। पिता जी प्रयागराज में एक प्रेस/कचहरी में मुंशी (Clerk) के रूप में कार्य करते थे। वे बहुत ही धार्मिक और अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। वे नियमित रूप से रामायण का पाठ करते थे, जिसका गहरा प्रभाव बालक हरिवंश राय बच्चन पर भी पड़ा। उनका परिवार एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार था। प्रताप नारायण जी सादा जीवन जीने और अपनी परंपराओं को निभाने में विश्वास रखते थे। हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा के पहले खंड, 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' में अपने पिता के व्यक्तित्व और उनके संघर्षों का बहुत ही विस्तार और आत्मीयता से वर्णन किया है। 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' में ही उन्होंने अपनी माता के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की है और उनके संघर्षपूर्ण लेकिन धैर्यवान जीवन का वर्णन किया है। उनकी माता एक गृहिणी (Housewife) थीं।
- हरिवंश राय बच्चन जी का निधन 18 जनवरी 2003 को मुंबई में उनके निजी आवास (घर) पर हुआ था।
उनके निधन से जुड़ी कुछ खास बातें निम्नलिखित हैं:
- स्थान: उनका निधन मुंबई के जुहू स्थित उनके प्रसिद्ध बंगले 'प्रतीक्षा' (Prateeksha) में हुआ था।
- कारण: वे लंबे समय से बीमार चल थे और सांस संबंधी गंभीर बीमारी (respiratory ailment) से जूझ रहे थे।
- समय: शनिवार की रात लगभग 11:40 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उस समय उनके पुत्र अमिताभ बच्चन, बहू जया बच्चन और परिवार के अन्य सदस्य उनके पास ही थे।
उनके निधन के बाद, उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए 'प्रतीक्षा' बंगले पर ही रखा गया था, जहाँ साहित्य और सिनेमा जगत की तमाम बड़ी हस्तियां उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंची थीं। उनका अंतिम संस्कार मुंबई के जुहू स्थित शवदाह गृह में किया गया था।
प्रमुख साहित्यिक योगदान
बच्चन जी की लेखन शैली बहुत ही सरल, सुबोध और सीधे दिल को छू लेने वाली थी। उन्होंने जटिल दर्शन को भी आम आदमी की भाषा में पिरोया।
- मधु-त्रयी
- मधुशाला (1935): जिसने उन्हें रातों-रात लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया।
- मधुबाला (1936)
- मधुकलश (1937)
- जीवन का दर्शन: यहाँ 'मधुशाला' केवल शराबखाना नहीं, बल्कि संसार का प्रतीक है। 'प्याला' मनुष्य का हृदय है और 'साकी' नियति (भाग्य)।
- सूफीवाद और मस्ती: उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव इन पर स्पष्ट दिखता है। इसमें जीवन के दुखों को भूलकर वर्तमान क्षण को आनंद के साथ जीने का संदेश है।
- सामाजिक एकता: बच्चन जी ने मधुशाला के माध्यम से धर्म और जाति के बंधनों पर प्रहार किया। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति थी— "मुसलमान और हिंदू हैं दो, एक मगर उनका प्याला... मेल कराती मधुशाला।"
- क्षणिकता: जीवन नश्वर है, इसलिए जो समय पास है उसे प्रेम और उल्लास के साथ जीना चाहिए।
- तेरा हार (1929): उनका प्रारम्भिक काव्य संग्रह है। इसमें कवि की प्रारंभिक कोमल भावनाएं और छायावादी प्रभाव झलकता है। यह प्रेम की शुरुआती अनुभूतियों और जिज्ञासाओं का संग्रह है।
- निशा निमंत्रण: यह उनकी सबसे प्रभावशाली कृतियों में से एक है। इसकी रचना उनकी पहली पत्नी (श्यामा जी) के निधन के बाद हुई थी। इसकी विषयवस्तु गहन दुख, अकेलापन और मृत्यु का सन्नाटा है। इसमें प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपनी आंतरिक पीड़ा को व्यक्त किया है।
- पुनर्मिलन और उल्लास: दूसरी पत्नी (तेजी बच्चन) के आने के बाद उनके काव्य में फिर से खुशियां लौटीं।
- प्रेम का नया स्वरूप: यहाँ प्रेम केवल विरह नहीं है, बल्कि जीवन को ऊर्जा देने वाला तत्व है। 'मिलन यामिनी' में मिलन के सुखद क्षणों और वैवाहिक जीवन की मधुरता का वर्णन है।
- आशावादी दृष्टिकोण: 'सतरंगिनी' में कवि के भाव सतरंगी रंगों की तरह विविध हैं, जहाँ वे निराशा से निकलकर कर्म और उमंग की ओर बढ़ते हैं।
| रचना श्रेणी | मुख्य भाव / विषयवस्तु |
| मधु-त्रयी | दार्शनिक मस्ती, हालावाद, सामाजिक सद्भाव और जीवन का आनंद। |
| निशा निमंत्रण | व्यक्तिगत शोक, एकांत, विरह और अंधेरे की अनुभूति। |
| सतरंगिनी / मिलन यामिनी | प्रेम, मिलन, आशा और जीवन के प्रति सकारात्मकता। |
1935 में प्रकाशित 'मधुशाला' ने उन्हें रातों-रात लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया। उन्होंने 'मधु', 'शाला', 'साकी' और 'प्याला' जैसे शब्दों के माध्यम से जीवन के गहरे दर्शन, सामाजिक एकता और प्रेम को व्यक्त किया।
"मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,किस पथ से जाऊँ? असमंजस में है वह भोलाभाला,अलग-अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ -राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।"
भाषा और शैली
बच्चन जी ने हिंदी काव्य को 'किताबी' बोझ से मुक्त कर उसे 'लोकप्रिय' बनाया। उनकी भाषा में अवधी और तत्सम शब्दावली का सुंदर मेल मिलता है। उनकी कविताओं में गेयता (लय) होती है, जिसे आज भी मंचों पर बड़े चाव से गाया जाता है।
सम्मान और पुरस्कार
साहित्य के प्रति उनके समर्पण के लिए उन्हें कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया:
| पुरस्कार का नाम | वर्ष | टिप्पणी/कृति |
| सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार | 1966 | उनकी कृति 'चौंसठ रूसी कविताएँ' के लिए। |
| साहित्य अकादमी पुरस्कार | 1968 | उनके काव्य संग्रह 'दो चट्टानें' के लिए। |
| पद्म भूषण | 1976 | साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए। |
| सरस्वती सम्मान | 1991 | उनकी चार खंडों वाली प्रसिद्ध आत्मकथा के लिए। |
व्यक्तिगत जीवन का प्रभाव
उनके जीवन के व्यक्तिगत संघर्ष, विशेषकर उनकी पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु का दुःख और फिर तेजी बच्चन के साथ उनका वैवाहिक जीवन, उनके काव्य में स्पष्ट रूप से झलकता है। उनके पुत्र अमिताभ बच्चन ने भारतीय सिनेमा में उनके संस्कारों और कविताओं को एक नई पहचान दी है।
बच्चन जी ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी रचनाएं आज भी पाठकों को संघर्ष के समय में साहस और प्रेम की प्रेरणा देती हैं।
शिक्षा -
हरिवंश राय बच्चन जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में 1941 से 1955 तक प्राध्यापक (Lecturer) रहे।
उनके इस कार्यकाल से जुड़ी कुछ प्रमुख जानकारी इस प्रकार है:
- नियुक्ति: उनकी नियुक्ति 1941 में हुई थी। उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय को 'पूर्व का ऑक्सफोर्ड' (Oxford of the East) कहा जाता था।
- कैम्ब्रिज अंतराल: इसी कार्यकाल के दौरान वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए थे। उन्होंने 1952 से 1954 के बीच कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में अपनी Ph.D. पूरी की।
- इस्तीफा और नई जिम्मेदारी: 1955 के अंत में उन्होंने विश्वविद्यालय से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में 'हिंदी विशेषज्ञ' के रूप में नियुक्त होकर दिल्ली चले गए।
महत्वपूर्ण समय रेखा -
| कार्य/पद | समय अवधि |
| इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक | 1941 से 1952 तक |
| कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) से Ph.D. प्राप्त की | 1952 से 1954 (उन्हें 1954 में डिग्री मिली) |
| आकाशवाणी (अमृतसर और दिल्ली) में सेवा | 1955 (कुछ समय के लिए) |
| भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ | 1955 से 1966 तक |
| राज्यसभा के लिए मनोनीत सदस्य उनके साहित्यिक योगदान के लिए | 1966 से 1972 तक |
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बिताया गया यह समय उनके साहित्यिक जीवन के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसी दौरान उनकी कई प्रसिद्ध रचनाएं सामने आईं और वे एक लोकप्रिय कवि के रूप में स्थापित हुए।
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प्रमुख रचनाएँ :
- मधुशाला (1935),
- मधुबाला (1938),
- मधुकलश (1938),
- निशा निमंत्रण,
- एकांत संगीत,
- आकुल-अंतर,
- मिलनयामिनी,
- सतरंगिणी, आरती और अंगारे,
- नए पुराने झरोखे,
- टूटी-फूटी कड़ियाँ (काव्य संग्रह);
- क्या भूलूँ क्या याद करूँ,
- नीड़ का निर्माण फिर,
- बसेरे से दूर,
- दशद्वार से सोपान तक (आत्मकथा चार खंड);
- हैमलेट,
- जनगीता,
- मैकबेथ (अनुवाद);
- प्रवासी की डायरी (डायरी)
'राय' और 'बच्चन' दोनों लिखने का कारण -
- महत्वपूर्ण तथ्य: उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी उल्लेख किया है कि उन्होंने जानबूझकर 'बच्चन' को अपनाया ताकि वे किसी जातिगत बंधन में न बंधें। आज उनके परिवार की पहचान इसी नाम से है।
'मधु-त्रयी'
- मधुशाला (1935): यह बच्चन जी की सबसे प्रसिद्ध कृति है। इसमें रुबाइयों के माध्यम से जीवन के दर्शन को मदिरा, प्याला और साकी के प्रतीकों से समझाया गया है।
- मधुबाला (1936): 'मधुशाला' की सफलता के बाद यह काव्य संग्रह आया, जिसमें प्रेम और सौंदर्य का अधिक गहन चित्रण है।
- मधुकलश (1937): इस कृति में कवि का दृष्टिकोण थोड़ा अधिक गंभीर और दार्शनिक हो जाता है। इसमें जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु पर विचार किया गया है।
बच्चन जी ने छायावाद की अत्यंत कठिन और संस्कृत निष्ठ भाषा के स्थान पर जन-साधारण की भाषा को अपनाया।
- प्रांजल खड़ी बोली: उनकी मुख्य भाषा 'खड़ी बोली' है, जो बहुत ही शुद्ध, परिष्कृत और स्पष्ट है।
- शब्दों का चयन: उनकी भाषा में तीन प्रकार के शब्दों का अद्भुत संगम मिलता है:
- तत्सम शब्द: गम्भीर भावों को व्यक्त करने के लिए उन्होंने संस्कृत के शब्दों का प्रयोग किया।
- तद्भव शब्द: कविता को सहज बनाने के लिए लोक-प्रचलित हिन्दी शब्दों का उपयोग।
- उर्दू-फारसी के शब्द: 'मधुशाला' जैसी रचनाओं में उन्होंने 'साकी', 'पैमाना', 'मस्जिद' जैसे उर्दू शब्दों का बहुत ही खूबसूरती से प्रयोग किया है।
- सरलता और स्पष्टता: उनकी भाषा में कोई उलझन नहीं है। वे जो कहना चाहते हैं, वह सीधे पाठक के हृदय तक पहुँचता है।
2. 'शैली' (Style)
शैली के मामले में बच्चन जी ने अपने समकालीन कवियों से एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना, जिसे 'हालावाद' भी कहा जाता है।
- आत्मकथात्मक शैली (Autobiographical Style): उनकी रचनाओं में 'मैं' की प्रधानता है। वे अपनी निजी अनुभूतियों, सुख-दुख और संघर्षों को इस तरह लिखते हैं जैसे वे अपनी ही कहानी सुना रहे हों।
- गेयता और संगीतात्मकता (Musicality): बच्चन जी की शैली की सबसे बड़ी विशेषता उसका 'गाये जाने योग्य' होना है। छंदों का अनुशासन और शब्दों की लय ऐसी है कि उनकी कविताएँ सुनते ही मन में बैठ जाती हैं।
- प्रतीकात्मक शैली (Symbolism): उन्होंने प्रतीकों के माध्यम से गूढ़ बातें कहीं। उदाहरण के लिए— मधुशाला (संसार), प्याला (मनुष्य का हृदय), और मदिरा (जीवन की संवेदनाएँ)।
- संवादात्मक शैली: उनकी कविताओं और विशेषकर आत्मकथा में ऐसा लगता है जैसे वे पाठक से आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हों।
- अलंकारों का सहज प्रयोग: उन्होंने कविता को बोझिल बनाने के लिए अलंकारों का प्रयोग नहीं किया, बल्कि भावों को उभारने के लिए रूपक, उपमा और मानवीकरण अलंकारों का सहारा लिया।
बच्चन जी की आत्मकथा हिंदी साहित्य की सबसे बेहतरीन आत्मकथाओं में से एक मानी जाती है। यह चार खंडों में विभाजित है:
- क्या भूलूँ, क्या याद करूँ
- नीड़ का निर्माण फिर
- बसेरे से दूर
- दशद्वार से सोपान तक
- विषयवस्तु: इसमें बच्चन जी ने अपने पूर्वजों, अपने जन्म, बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि का वर्णन किया है।
- मुख्य बिंदु: इसमें उनके पैतृक गांव, कायस्थ परिवार की परंपराओं और उनकी पहली पत्नी श्यामा के साथ उनके संक्षिप्त वैवाहिक जीवन और उनकी मृत्यु से उपजे गहरे दुख का मार्मिक चित्रण है। यह खंड उनकी प्रारंभिक संघर्षपूर्ण मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
- विषयवस्तु: श्यामा जी की मृत्यु के बाद कवि के जीवन में जो शून्यता आई थी, उससे उबरने की कहानी इसमें है।
- मुख्य बिंदु: इसमें उनकी दूसरी पत्नी तेजी बच्चन के साथ उनके विवाह, नए घर के निर्माण और जीवन के प्रति फिर से जगी आशा का वर्णन है। "नीड़" (घोंसला) यहाँ उनके परिवार और सुखी जीवन का प्रतीक है।
- विषयवस्तु: इसमें बच्चन जी के इलाहाबाद से बाहर जाने और विशेष रूप से इंग्लैंड (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी) में उनके प्रवास का वर्णन है।
- मुख्य बिंदु: पीएचडी की पढ़ाई के लिए विदेश जाना, वहां का संघर्ष, अकेलापन और एक भारतीय छात्र के रूप में यूरोपीय संस्कृति को देखने का नजरिया इसकी मुख्य विषयवस्तु है। इसमें उनके व्यक्तित्व के वैश्विक विस्तार की झलक मिलती है।
- विषयवस्तु: इसमें इलाहाबाद से दिल्ली आने, विदेश मंत्रालय में उनकी नौकरी, राज्यसभा सदस्यता और उनके अंतिम समय के अनुभवों का संकलन है।
- मुख्य बिंदु: इसमें उनके साहित्यिक सम्मानों, समकालीन राजनेताओं और साहित्यकारों के साथ उनके संबंधों का जिक्र है। "दशद्वार" उनके मुंबई वाले घर के एक हिस्से का नाम भी था, जहाँ से वे जीवन के अंतिम सोपान (सीढ़ी) तक पहुँचे।
| खंड | मुख्य विषय | जीवन का चरण |
| क्या भूलूँ, क्या याद करूँ | जड़ें, पूर्वज और प्रथम पत्नी का वियोग | बचपन और युवावस्था |
| नीड़ का निर्माण फिर | नया जीवन और तेजी बच्चन से विवाह | पुनरागमन और गृहस्थी |
| बसेरे से दूर | विदेश प्रवास और कैंब्रिज के दिन | शिक्षा और संघर्ष |
| दशद्वार से सोपान तक | दिल्ली प्रवास, सफलता और बुढ़ापा | प्रौढ़ावस्था और सेवानिवृत्ति |
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