सम्बोधन और परिचय
आज इस पावन अवसर पर मुझे 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' अभियान के अंतर्गत हमारे देश के पूर्वोत्तर आंचल में बसे दो अत्यंत मनोरम, जीवंत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्यों—मेघालय और नागालैंड की संस्कृति पर बोलने का अवसर प्राप्त हुआ है।
हमारा भारत अनेकता में एकता का एक अनूठा संगम है। यहाँ अलग-अलग बोलियाँ, वेशभूषाएँ, मान्यताएँ और परंपराएँ एक साथ मिलकर एक अखंड राष्ट्र की रचना करती हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल के सपनों को साकार करने के उद्देश्य से शुरू की गई 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की यह पहल हमें सिखाती है कि भौगोलिक दूरियाँ हमारे दिलों को बाँधने से नहीं रोक सकतीं। जब हम पूर्वोत्तर भारत की बात करते हैं, तो हमारे मन में पर्वतों की गोद में बसे जंगलों, लोकधुनों और एक ऐसी जीवनशैली की छवि उभरती है, जो आधुनिकता की होड़ में भी अपनी जड़ों से पूरी तरह जुड़ी हुई है।
मेघालय: बादलों की ओट में प्रकृति और नारी शक्ति का वंदन
सबसे पहले मैं बात करना चाहूँगी मेघालय की। मेघालय शब्द दो संस्कृत शब्दों के मेल से बना है—'मेघ' और 'आलय', जिसका सीधा अर्थ है 'बादलों का घर'। यह वही पवित्र धरती है जहाँ बादलों को छूते हुए पर्वत, गगनचुंबी जलप्रपात और एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव मौलिन्नॉन्ग स्थित हैं।
मेघालय की आबादी में मुख्य रूप से तीन जनजातियाँ शामिल हैं—खासी, जयंतिया और गारो। इन तीनों ही समुदायों की अपनी समृद्ध परंपराएँ और जीवन दर्शन हैं। मेघालय की संस्कृति की जो बात पूरी दुनिया को चकित और प्रेरित करती है, वह है यहाँ की मातृसत्तात्मक और मातृवंशीय सामाजिक व्यवस्था।
जहाँ अधिकांश समाजों में वंश का नाम पिता से पुत्र को मिलता है, वहीं मेघालय में यह परंपरा माँ से बेटी की ओर चलती है। यहाँ परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकार घर की सबसे छोटी बेटी—जिसे खासी भाषा में 'खातदुह' कहा जाता है—को सौंपा जाता है। वह केवल संपत्ति की मालिक नहीं बनती, बल्कि बुजुर्ग माता-पिता और पूरे परिवार के भरण-पोषण व देखभाल की मुख्य संरक्षक भी होती है। विवाह के बाद पुरुष ससुराल जाकर रहते हैं। यह व्यवस्था यह दर्शाती है कि जनजातीय समाज ने सदियों पहले ही लैंगिक समानता और नारी के सर्वोच्च सम्मान को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था।
मेघालय के लोगों की प्रकृति के साथ समरसता अद्भुत है। इसका सबसे सजीव प्रमाण हैं यहाँ के जीवित जड़ पुल (Living Root Bridges)। चेरापूंजी और आसपास के दुर्गम क्षेत्रों में खासी और जयंतिया जनजातियों के लोगों ने सदियों की साधना से फिकस इलास्टिका (रबर के पेड़) की जड़ों को इस तरह दिशा दी कि वे समय के साथ मजबूत पुलों में बदल गईं। ये पुल सीमेंट-कंक्रीट की तरह पुराने होकर टूटते नहीं, बल्कि समय के साथ और भी अधिक मजबूत होते जाते हैं। यह तकनीक सिखाती है कि प्रकृति से लड़े बिना भी विकास के रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
मेघालय के लोकनृत्य और संगीत सीधे प्रकृति के चक्र से जुड़े हैं। गारो जनजाति का प्रमुख उत्सव 'वांगला' (Wangla Festival) है, जिसे 'सौ ढोलों का उत्सव' भी कहा जाता है। यह फसल कटाई के बाद सूर्य देवता 'सालजोंग' के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। जब पारंपारिक नगाड़ों की गूँज पर नर्तक अपनी पारंपरिक वेशभूषा में कदमताल करते हैं, तो प्रकृति भी उत्सव मनाती प्रतीत होती है। इसके अलावा खासी समुदाय का 'का शाद सुक मिनसिएम' और जयंतिया समुदाय का 'बेहदीनखलम' त्योहार भी बुरी शक्तियों को भगाने और अच्छी फसल की कामना के सुंदर सांस्कृतिक प्रतीक हैं।
यहाँ की पारंपरिक वेशभूषा—जैसे महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला 'जैनसेम' और रेशमी बुनाई वाले वस्त्र—सादगी और गरिमा का प्रतीक हैं। उनका आहार मुख्य रूप से चावल, सूअर का मांस, मछली और ताजी स्थानीय हरी पत्तियों व बाँस के अंकुरों पर आधारित होता है।
नागालैंड: शौर्य, गौरव और त्योहारों का आँगन
अब आइए अपनी सांस्कृतिक यात्रा को थोड़ा पूर्व की ओर मोड़ते हैं और पहुँचते हैं नागालैंड में। नागालैंड को भारत में 'त्योहारों की भूमि' (Land of Festivals) के नाम से जाना जाता है। यह बहादुर, स्वाभिमानी और कलाप्रिय नागा योद्धाओं की पावन भूमि है।
नागालैंड किसी एक जनजाति का नाम नहीं है, बल्कि यह लगभग 16 प्रमुख और कई उप-जनजातियों का एक समृद्ध गुलदस्ता है। इनमें अंगामी, आओ, कोन्याक, सुमी, लोथा और चखेसांग जैसी प्रमुख जनजातियाँ शामिल हैं। प्रत्येक जनजाति की अपनी एक स्वतंत्र बोली, अपने विशिष्ट सामाजिक नियम और अपनी अलग लोक परंपराएँ हैं। इन अलग-अलग बोलियों के बीच संवाद बनाए रखने के लिए यहाँ 'नागामीज़' भाषा का प्रयोग किया जाता है, जो एकता की एक अनोखी मिसाल है।
नागा संस्कृति की पहचान उनकी अद्भुत बुनाई और शॉल से है। नागालैंड में हाथ से बुनी गई शॉल केवल ठंड से बचने का कपड़ा नहीं है; यह एक सामाजिक दस्तावेज है। शॉल का रंग, उसका पैटर्न और उसमें की गई नक्काशी यह बताती है कि पहनने वाला किस जनजाति का है, समाज में उसका ओहदा क्या है और उसने जीवन में क्या वीरता दिखाई है। महिलाओं द्वारा कमर करघे (Loin Loom) पर बुनी गई ये शॉलें धैर्य और कलात्मक श्रेष्ठता का संगम हैं।
नागा समाज में समुदाय की भावना सर्वोपरि होती है। यहाँ का 'मोरुंग' (Morung) संस्थान ऐतिहासिक रूप से नागा युवकों का प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था। मोरुंग में युवा केवल युद्ध कौशल ही नहीं, बल्कि लोकगीत, लकड़ी की नक्काशी, शिकार की तकनीकें, बड़ों का आदर और अपने समाज के नैतिक मूल्य सीखते थे। आधुनिक शिक्षा के दौर में भी मोरुंग की यह सामूहिकता आज नागा जीवन का अटूट हिस्सा है।
नागालैंड की संस्कृति का सबसे भव्य रूप देखना हो तो हमें कोहिमा के पास किसामा हेरिटेज विलेज में आयोजित होने वाले हॉर्नबिल महोत्सव (Hornbill Festival) की ओर देखना होगा। हर वर्ष दिसंबर के पहले सप्ताह में आयोजित होने वाला यह महोत्सव 'त्योहारों का त्योहार' कहलाता है। इसका नामकरण हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर किया गया है, जो नागा लोककथाओं में अत्यंत पूजनीय है। इस मंच पर सभी नागा जनजातियाँ एक साथ एकत्रित होकर अपनी पारंपरिक वेशभूषा, सिर पर लगे जंगली सुअर के दाँतों और भालू के बालों से सजे मुकुट, युद्ध नृत्य और लोकगीतों का प्रदर्शन करती हैं।
इसके अतिरिक्त, अंगामी जनजाति का 'सेक्रेनी' त्योहार आत्म-शुद्धि का पर्व है, आओ जनजाति का 'मोआत्सू' बुआई के बाद की खुशी का उत्सव है, और कोन्याक जनजाति का 'आओलियांग' वसंत के आगमन का स्वागत करता है। नागा खान-पान में धुएँ में पकाया गया मांस, किण्वित बाँस के अंकुर (Fermented Bamboo Shoot) और दुनिया की सबसे तीखी मिर्चों में से एक 'भूत झोलकिया' का विशेष स्थान है।
विविधता में एकता: हमारा साझा दायित्व
मेरे प्रिय मित्रों, जब हम मेघालय और नागालैंड की जीवनशैली का गहराई से अध्ययन करते हैं, तो हमें कई ऐसे अमूल्य जीवन-मंत्र मिलते हैं जिन्हें आधुनिक भारत को अपने आचरण में उतारने की जरूरत है।
पहला पाठ है प्रकृति के प्रति अगाध आदर। मेघालय के लोग अपने जंगलों को 'पवित्र उपवन' (Sacred Groves) मानकर पूजते हैं, जहाँ से एक पत्ता तोड़ना भी वर्जित माना जाता है। नागालैंड के कई गाँवों (जैसे खोनोमा गाँव) ने शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाकर स्वयं को भारत का पहला 'ग्रीन विलेज' घोषित कर दिखाया। वे पर्यावरण को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति मानते हैं।
दूसरा पाठ है सामूहिकता और समानता। मेघालय में मातृसत्तात्मक व्यवस्था महिलाओं को नेतृत्व और आत्मसम्मान देती है, तो नागालैंड की जनजातीय व्यवस्था में समाज का हर व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहता है।
'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' केवल कोई नारा नहीं है, यह इस बात का संकल्प है कि हम देश के कोने-कोने में बसे अपने भाई-बहनों की संस्कृति को समझें, उनके प्रति आदर भाव रखें और उनकी समृद्ध विरासत पर गर्व करें। मेघालय की शांत वादियों के जलप्रपात और नागालैंड की पहाड़ियों से गूँजती लोकधुनों में वही भारतीय प्राण धड़कते हैं, जो गंगा के मैदानों या दक्षिण के सागर तटों पर धड़कते हैं।
एक छात्रा होने के नाते, मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि जब हम पूर्वोत्तर भारत के इस अद्वितीय इतिहास, कला, साहित्य और मूल्यों को अपनी पाठ्यपुस्तकों और सोच में शामिल करेंगे, तभी हमारा राष्ट्र सच्चे अर्थों में श्रेष्ठ बनेगा।
आइए, हम सब मिलकर अपनी विविधता का सम्मान करें, पूर्वोत्तर के अपने बंधुओं की इस समृद्ध विरासत को नमन करें और देश की एकता को अक्षुण्ण बनाए रखने का संकल्प लें।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ। आप सभी ने मुझे इतनी शांति और धैर्य से सुना, इसके लिए आप सभी का हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिंद! जय भारत!
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