भारत की महानता उसके विशाल मानचित्र से नहीं, बल्कि उसकी उस सांस्कृतिक गहराई से पहचानी जाती है जहाँ अनगिनत सुर मिलकर एक ही राष्ट्रीय राग का निर्माण करते हैं। जब हम सरदार वल्लभभाई पटेल के स्वप्न 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की बात करते हैं, तो यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि पूरे देश को एक साझी भावनात्मक डोर में पिरोने का राष्ट्रीय संकल्प बन जाता है।
इसी संकल्प के साथ जब हमारी दृष्टि पूर्वोत्तर के दो अद्वितीय राज्यों—नागालैंड और मेघालय—पर पड़ती है, तो हमें एहसास होता है कि विविधता में एकता के वास्तविक मायने क्या हैं।
साथियों, भाषा किसी भी समाज की स्मृतियों का आईना होती है। नागालैंड में 16 से अधिक प्रमुख जनजातियाँ—अंगामी, आओ, सेमा, लोथा, कोन्याक—अपनी स्वतंत्र बोलियों के साथ रहती हैं। इन सबके बीच आपसी संवाद के लिए जन्मी 'नागामीज़' भाषा दिलों को जोड़ती है। वहीं मेघालय का भाषाई संसार खासी, गारो और जयंतिया के इर्द-गिर्द घूमता है, जहाँ खासी भाषा भारत के प्राचीन आग्नेय (Austroasiatic) भाषा परिवार का दुर्लभ रत्न है। दोनों ही समाजों में लोकगीतों और लोककथाओं की मौखिक परंपरा ने पीढ़ियों से अपने संस्कारों को जीवित रखा है।
जब हम इनकी वेशभूषा और हस्तकला को देखते हैं, तो सादगी और गरिमा का अद्भुत संगम नजर आता है। नागालैंड की कमर-करघे पर बुनी गई शॉलें केवल वस्त्र नहीं, बल्कि पहनने वाले के सामाजिक सम्मान और शौर्य की गाथा हैं। मेघालय में खासी महिलाओं का 'जैनसेम' और रेशमी 'धारा', तथा गारो समाज का 'दकमाना' प्रकृति के रंगों की शालीन अभिव्यक्ति है। नागालैंड में काष्ठ नक्काशी से सजे 'मोरुंग' और मेघालय में बाँस और पत्तों से बनी पारंपरिक छतरी 'क्नुप' यह सिद्ध करते हैं कि हमारी कला सीधे प्रकृति की गोद से उपजी है।
पर्व और संगीत की बात करें, तो नागालैंड के 'लॉग ड्रम' की गूँज पर थिरकते कदम और विश्व प्रसिद्ध 'हॉर्नबिल महोत्सव' का उल्लास पूरी दुनिया को सम्मोहित करता है। दूसरी तरफ, मेघालय का 'शाद सुक मिनसिएम' और सौ नगाड़ों की थाप पर किया जाने वाला गारो समाज का 'वांगला नृत्य' प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की अनुपम मिसाल हैं।
देवियों और सज्जनों, आज जब हम आधुनिक समाज में महिला सशक्तीकरण और समानता की बातें करते हैं, तब मेघालय सदियों से अपनी मातृवंशीय व्यवस्था (Matrilineal System) के ज़रिए पूरे राष्ट्र का मार्गदर्शन कर रहा है। यहाँ वंश और संपत्ति माता से पुत्री को मिलती है, और परिवार की सबसे छोटी बेटी 'खाददुह' संपत्ति की संरक्षक बनती है। यह व्यवस्था महिलाओं को समाज में सर्वोच्च सुरक्षा और आदर प्रदान करती है। वहीं नागालैंड का समाज अपने अद्वितीय 'सामुदायिक अनुशासन' के लिए जाना जाता है, जहाँ गाँव का हर सुख-दुख पूरे समाज का साझा सरोकार होता है।
और पर्यावरण के प्रति इनकी चेतना तो आज पूरे विश्व के लिए एक आदर्श है! मेघालय के जीवित जड़ पुल (Living Root Bridges) यह साबित करते हैं कि बिना सीमेंट और लोहे के भी सदियों तक चलने वाले पुल बनाए जा सकते हैं। एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव मावलिननॉन्ग हमें सिखाता है कि स्वच्छता नियमों से नहीं, संस्कारों से आती है। वहीं नागालैंड का खोनोमा गाँव, जो भारत का पहला हरित गाँव बना, यह प्रेरणा देता है कि समाज अपनी आदतों को बदलकर जंगलों और वन्यजीवों का सबसे बड़ा रक्षक बन सकता है।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि जब मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या तमिलनाडु का नागरिक नागा शॉल के मान को अपना मान समझे, मेघालय के जड़ पुलों और मातृसत्ता के सम्मान को अपनी धरोहर माने—तभी 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का ध्येय पूर्ण होता है।
नागालैंड की पहाड़ियों का शौर्य और मेघालय के बादलों की शांति मिलकर हमारी भारतीयता को संपूर्ण बनाते हैं। आइए, इन सांस्कृतिक तारों को और मजबूत करें और एक स्वर में कहें—
विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है,एक भारत, श्रेष्ठ भारत!
धन्यवाद। जय हिन्द! जय भारत!
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