आदरणीय निर्णायक मंडल, शिक्षक गण और मेरे प्रिय साथियों!
भारत की पहचान किसी एक रंग, एक भाषा या एक परंपरा से नहीं, बल्कि अनेकता में गूंजती एक साझी चेतना से है। जब हम सरदार वल्लभभाई पटेल के 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के विजन को देखते हैं, तो हमारी नज़र स्वाभाविक रूप से देश के पूर्वोत्तर की ओर मुड़ती है—जहाँ बादलों की गोद और हरी-भरी पहाड़ियों के बीच दो अद्भुत राज्य बसते हैं: नागालैंड और मेघालय।
साथियों, ये दोनों राज्य केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने की दो मजबूत धड़कनें हैं।
सबसे पहले बात करते हैं इनकी सामाजिक संरचना की। एक तरफ नागालैंड का कबीलाई समाज है, जहाँ 16 से अधिक प्रमुख जनजातियाँ—अंगामी, आओ, कोन्याक और सेमा—पारंपरिक अनुशासन और विलेज काउंसिल के लोकतांत्रिक मूल्यों पर चलती हैं। यहाँ की ऐतिहासिक 'मोरुंग' परंपरा युवाओं को सामूहिक जीवन और कौशल सिखाती है। वहीं दूसरी ओर, मेघालय विश्व के दुर्लभ मातृवंशीय (Matrilineal) समाजों का चमकता उदाहरण है। यहाँ खासी, गारो और जयंतिया समाजों में वंश और संपत्ति माता से पुत्री को मिलती है, और परिवार की सबसे छोटी बेटी 'खादूह' संरक्षक बनती है। यह व्यवस्था पूरे देश को महिला सशक्तीकरण और लैंगिक सम्मान का सीधा पाठ पढ़ाती है।
जब हम इनकी वेशभूषा और पहचान को देखते हैं, तो नागा शॉल केवल कपड़ा नहीं, बल्कि शौर्य और प्रतिष्ठा का प्रतीक दिखती है; हर रंग और धारियाँ एक कहानी बयां करती हैं। मेघालय में खासी महिलाओं का लालित्यपूर्ण 'जैनसेम' और गारो समाज का 'दाकमांदा' प्रकृति के रंगों को सादगी के साथ प्रस्तुत करते हैं।
खान-पान की बात करें, तो नागालैंड का 'अखूनी', बैम्बू शूट और स्मोक्ड डिशेज हों, या मेघालय का 'जाडोह' और 'दोहनेइहियोंग'—इनका स्वाद सीधे प्रकृति के सान्निध्य और प्राकृतिक संरक्षण की तकनीक से जुड़ा है।
और जब उत्सवों की गूंज उठती है, तो किसामा हेरिटेज विलेज में नागालैंड का 'हॉर्नबिल महोत्सव' पूरे विश्व को अपनी ओर खींचता है, जहाँ लॉग ड्रम और लोकगीत गूंजते हैं। दूसरी ओर मेघालय में गारो समुदाय का 100 ड्रमों पर थिरकता 'वांगला नृत्य' और खासी समाज का 'नोंगक्रेम' हमें धरती और सूर्य के प्रति कृतज्ञ होना सिखाते हैं।
देवियों और सज्जनों, आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब ये दोनों राज्य हमारे पथ-प्रदर्शक हैं। मेघालय के जीवित जड़ सेतु (Living Root Bridges) बायो-इंजीनियरिंग का ऐसा चमत्कार हैं जो समय के साथ और मजबूत होते हैं। वहीं नागालैंड का खोनोमा गाँव, जो एशिया का पहला 'ग्रीन विलेज' बना, यह साबित करता है कि समुदाय चाहे तो अपनी प्रकृति की रक्षा कैसे कर सकता है।
'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' का अर्थ केवल मानचित्र पर एक होना नहीं, बल्कि दिलों से एक होना है। जब दिल्ली, गुजरात या मध्य प्रदेश में बैठा नागरिक नागालैंड के अनुशासन और मेघालय के प्रकृति-प्रेम को अपना समझता है, तभी भारत सच में श्रेष्ठ बनता है।
नागालैंड और मेघालय पूर्वोत्तर का केवल आभूषण नहीं हैं, बल्कि 'एक भारत' की माला के वे अनमोल मोती हैं, जिनके बिना हमारी राष्ट्रीय पहचान अधूरी है।
आइए, इस विविधता को समझें, इसे नमन करें और साथ मिलकर कहें— एक भारत, श्रेष्ठ भारत!
धन्यवाद। जय हिंद!
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